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रविवार, मार्च 2

अब बहुत हुआ लुकना-छिपना


अब बहुत हुआ लुकना-छिपना

कब अपना घूंघट खोलेगा 
कब हमसे भी तू बोलेगा, 
राधा का तू मीरा का भी 
कब अपने सँग भी डोलेगा! 

अपना राज छिपा क्यों रखता 
क्यों रस तेरा मन ना चखता, 
जब तू ही तू है सभी जगह 
इन नयनों को क्यों ना दिखता! 

अब और नहीं धीरज बँधता
मुँह मोड़ भला क्यों तू हँसता, 
अब बहुत हुआ लुकना-छिपना  
तुझ बिन ना अब यह दिल रमता! 

जो तू है, सो मैं हूँ, सच है 
पर मुझको अपनी खबर कहाँ, 
अब तू ही तू दिखता हर सूं 
जाती है अपनी नजर जहाँ ! 

यह कैसा खेल चला आता 
तू झलक दिखा छुप जाता है, 
पलकों में बंद करूं कैसे 
रह-रह कर बस छल जाता है ! 

बुधवार, सितंबर 6

कृष्ण रंग में डूबा अंतर



कृष्ण रंग में डूबा अंतर 

श्याम रंग में भीगा अंतर
भीगी मन की धानी चूनर,
कोरा जिसको कर डाला था
विरह नीर में डुबो डुबोकर !

जन्मों से था जो सूखा सा
जैसे कोई मरुथल बंजर,
कैसे हरा-भरा खिलता है
कृष्ण रंग में डूबा अंतर !

एक डगर थी सूनी जिस पर
पनघट नजर नहीं आता था,
काँटों में उलझा था दामन
श्यामल रंग से न नाता था !

भर पिचकारी तन पे मारी
सप्त रंगी सी पड़ी फुहार,
 पोर-पोर शीतल हो झूमा
फगुनाई की बहती  बयार !

रंग दिया किस रंग में आज 
कान्हा रंग रसिया ह्रदय का,
राधा रंग गई, मीरा भी 
हुआ सुवासित कण-कण तन का !



शुक्रवार, अप्रैल 10

गीत यह अनमोल

गीत यह अनमोल

मीरा ने गाया था कभी गीत यह अनमोल लीन्हा री मैंने कान्हा.. बिन मोल ! कोई कृत्य जहाँ नहीं पहुँचता न कोई वाणी कोई पदार्थ तो क्या ही पहुँचेगा उस लोक में है जहाँ का वह वासी आज भी वह मिल रहा है अमोल ! क्यों उस निराकार को आकार दे नयन मुंद जाते हैं उस निरंजन को हम हर रंज में आवाज देते हैं वह जो है सदा हर जगह खो गया मानकर उसे पुकारते हैं ! जब तन अडोल हो और मन शून्य तब जो भीतर सागर सा गहरा और अम्बर सा विशाल कुछ भास आता है उसके पार ही वह प्रतीक्षारत है कुछ करके नहीं कुछ न करके ही, यानि बिन मोल उसे पाया जाता है वहाँ हमारा होना उसके होने में समा जाता है !

गुरुवार, मार्च 21

श्याम रंग में भीगा अंतर



श्याम रंग में भीगा अंतर


रंग डाला किस रंग में तूने
कान्हा रंग रसिया है मन का,
राधा रंगी थी मीरा जिसमें
हुआ सुवासित कण-कण तन का !

श्याम रंग में भीगा अंतर
भीगी मन की धानी चूनर,
कोरा जिसको कर डाला था
विरह नीर में डुबो डुबोकर !

जन्मों से से जो सूखा सा था
जैसे कोई मरुथल बंजर,
कैसे हरा-भरा खिलता है
श्याम रंग में रंग के अंतर !

एक डगर थी सूनी जिस पर
पनघट नजर नहीं आता था,
काँटों में उलझा था दामन
श्यामल रंग से न नाता था !

भर पिचकारी तन पे मारी
सतरंगी सी पड़ी फुहार,
शीतल पोर पोर हो झूमा
फगुनाई की बही बयार !

बुधवार, जुलाई 4

अब राज छिपा कब तक रखे


अब राज छिपा कब तक रखे


कब अपना घूंघट खोलेगा
कब हमसे भी तू बोलेगा,
राधा का तू मीरा का भी
कब अपने सँग भी डोलेगा !

अब राज छिपा कब तक रखे
क्यों रस तेरा मन न चखे,
जब तू ही तू ही सभी जगह
इन नयनों को क्यों न दीखे !

अब और नहीं धीरज बंधता
मुँह मोड़ के क्यों है तू हँसता,
अब बहुत हुआ लुकना-छिपना  
तुझ बिन ना अब यह दिल रमता !

जो तू है, सो मैं हूँ, सच है
पर मुझको अपनी खबर कहाँ,
अब तू ही तू दिखता हर सूं
जाती है अपनी नजर जहाँ !

यह कैसा खेल चला आता
तू झलक दिखा छुप जाता है,
पलकों में बंद करूं कैसे
रह-रह कर बस छल जाता है !