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बुधवार, जून 28

हर बार

हर बार 


हर संघर्ष जन्म देता है सृजन को 

अत: भागना नहीं है उससे 

चुनौती को अवसर में बदल लेना है 

कई बार बहा ले जाती है बाढ़ 

व्यर्थ  अपने साथ 

और छोड़ जाती है 

कोमल उपजाऊ माटी की परत खेतों में 

तूफ़ान उड़ा ले जाते हैं धूल के ग़ुबार 

और पुन: सृजित होता है नव निर्माण 

जीवन जैसा मिले 

वैसा ही गले लगाना है 

उस परमात्मा को 

हर बहाने से दिल में बसाना है 

जो पावन है वही शेष रहेगा 

मायावी हर बार चला ही जाएगा 

जैसे मृत्यु ले जाएगी देह 

पर आत्मा तब भी निहारती रहेगी ! 


मंगलवार, मई 18

जीवन तो है इक क्रीड़ांगन

जीवन तो है इक क्रीड़ांगन

जीवन जो उपहार मिला था 

उसे व्यर्थ ही बोझ बनाया,

घड़ी देखकर जगते-सोते 

रिश्तों को भी सोच बनाया ! 


तन-मन जैसे यंत्र बन गए  

अब स्वत:स्फूर्त कहाँ है घटता,  

वही सवाल, जवाब भी वही 

गुम हो गयी उर की सरसता !


नहीं शेष सुवास साँसों में

जब भी वे लघु होती जातीं, 

जितना बड़ा दायरा दिल का 

उतना खुद को वे फैलातीं !


गहराई जब मन में होगी 

होगी गहरी लंबी सांसें, 

भय से भरा हुआ जब अंतर 

कंपन से भर जाती सांसें !


नहीं भूमि यह संघर्षों  की 

जीवन तो है इक क्रीड़ांगन, 

छोटे-छोटे अनुभव मिलते

कण-कण में हो पावन दर्शन !


कुदरत का सान्निध्य अनूठा 

श्रम के स्वेद बिंदु  मस्तक पर, 

जीवन एक खेल बन जाता 

चाह नहीं जब भारी मन पर !

 

रविवार, फ़रवरी 9

एक न एक दिन

एक न एक दिन... जहाँ दो हैं संघर्ष जारी रहेगा जहाँ दो हैं मार-काट नहीं रुकेगी कभी दूसरे की सोच पर मार अभी अन्य के विचार की काट जहाँ दो हैं वहाँ अहंकार टकराएगा एक यदि भीरु होगा दूसरा दबाएगा एक यदि सहिष्णु होगा दूसरा सताएगा जहाँ दो होंगे और समझ होगी वहीं चैन होगा जहाँ दो होंगे और आपसी सम्मान होगा वहीं शांति होगी कुछ तत्व हैं जो समझदारी को कमजोरी मानते हैं जो लड़ने-भिड़ने को होशियारी मानते हैं शांति के हिमायती सहते हैं हर अत्याचार पर एक न एक दिन वे भी हो जाते हैं लाचार अब उधर भी जज्बात उभरने लगते हैं अपनी पहचान के दीप जलने लगते हैं अब साफ हो गया है या तो बराबरी और समझदारी ही काम आएगी अन्यथा चैन घटता ही जाएगा....