गुरुवार, नवंबर 11

हर कोई अपने जैसा है

हर कोई अपने जैसा है 


न ऐसा न ही वैसा है, बस  

हर कोई अपने जैसा है !


भोला शावक भरे कुलाँचे 

वनराजा की शान अनोखी, 

गाँव की ग्वालिनें प्यारी हैं  

गरिमामयी महारानी भी !


यहाँ न कोई कम या ज़्यादा 

आख़िर नर है न कि पैसा है, 

न ऐसा न ही वैसा है, बस   

हर कोई अपने जैसा है !


कारीगर, मज़दूर  न होते  

महल-दुमहले कैसे बनते,   

अल्पज्ञ, अज्ञानी यदि न हो 

गुरुजनों  को कौन पूछते ! 


मित्र बने समझ यही अपनी

फिर दुःख जीवन में कैसा  है ? 

न ऐसा न ही वैसा है, बस   

हर कोई अपने जैसा है !



 

11 टिप्‍पणियां:

  1. यहाँ न कोई कम या ज़्यादा

    आख़िर नर है न कि पैसा है,

    न ऐसा न ही वैसा है, बस

    हर कोई अपने जैसा है !..चिंतनपूर्ण रचना।

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 12 नवंबर 2021 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  3. ​न ऐसा न ही वैसा है, बस  

    हर कोई अपने जैसा है !


    बहुत सुन्दर सृजन

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  4. अल्पज्ञ, अज्ञानी यदि न होते, गुरुजनों को कौन पूछते? सच कहा आपने। आपकी कविता के भाव को आत्मसात् कर लेने में ही मनुष्य का हित है।

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  5. कारीगर, मज़दूर न होते
    महल-दुमहले कैसे बनते,
    अल्पज्ञ, अज्ञानी यदि न हो
    गुरुजनों को कौन पूछते !
    बहुत ही उम्दा रचना

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  6. यहाँ न कोई कम या ज़्यादा

    आख़िर नर है न कि पैसा है,

    न ऐसा न ही वैसा है, बस

    हर कोई अपने जैसा है !..

    सही कहा नर है पैसा नही जिसे कम या ज्यादा समझा जाय सब समान हैं।
    बहुत ही लाजवाब सृजन।

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  7. जिज्ञासा जी, मनोज जी, जितेंद्र जी, अंकित जी, मनीषा जी व सुधा जी आप सभी का हृदय से स्वागत व आभार !

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  8. सच है ... ये सब फर्क हमारे खुद के पैदा किये हुवे हैं और किस्मत के नाम पर फिर उसी को दोष देते हैं जिसने सबको एक सा बनाया है ...

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