चेतन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चेतन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, जुलाई 30

शुभ कर्मों का बहे मकरंद

शुभ कर्मों का बहे मकरंद

​​चेतन अमर, अजर, अविनाशी 

प्रेम, शांति व हर्ष का सागर, 

अहंकार बिंधता स्वयं से 

अहंकार सीमित सम कायर !


जीवन जैसा है, वैसा है 

अहम उसे  स्वीकार न पाए,  

निज झूठी शान की ख़ातिर 

लोकमत का शिकार हो जाए ! 


सीधी, सरल चेतना निर्मल 

अहंकार कई दाँव खेले,  

झूठ की कई दीवारों में  

अपने हाथों क़ैदी हो ले ! 


क़ैद हुआ उनमें फिर खुद ही  

कसता, घुटता, पीड़ित होता, 

सच की एक मशाल जलाकर 

अंधकार चैतन्य हटाता  !


जय वहीं जहाँ सत्य पनपता 

जीवन सत्य  की खोज अनंत,

सत्य का पुष्प खिलेगा, जहाँ 

शुभ कर्मों का बहे मकरंद !


बुधवार, दिसंबर 2

पल-पल है चेतना नई सी

पल-पल है चेतना नई सी


ग्रह - नक्षत्र, धरा,रवि, चाँद 

पादप, पशु, नदिया, चट्टान,  

पवन डोलती तूफ़ां उठते 

सृष्टि पूर्ण मानव अनजान !


बंधी एक नियम, ऋत, क्रम में 

नित नूतन यह पुनर्नवा सी, 

अंतर घिरा अतीत धूम्र से 

पल-पल है चेतना नई सी !


सुख की चाह रहे भरमाती 

पीड़ा के वन में ले जाए, 

जितनी दौड़ लगे कम पड़ती 

भोला मन यह समझ न पाए !


जाने कब यह क्रम छूटेगा 

मन पर छाया भ्रम छूटेगा, 

ब्रह्मांड से एक हुआ फिर 

निज महिमा का बोध जगेगा !

 

मंगलवार, नवंबर 3

निज उजास का करने वितरण


निज उजास का करने वितरण

चिन्मय बसा रहे मेधा में

योग्य वरण के एक ईश है,

जग यह मोहक रूप धर रहा

सुंदर उससे कौन शीश है !

 

उसे जानना पाना उसको

हो शुभ जीवन का लक्ष्य यही,

जिससे परम प्रपंच घटा है

महिमा सदा अनंत अगम की !

 

वही श्रेष्ठ विभु सुख का सागर

नीर, वायु, पावक का दायक, 

जड़ यह पाँच भूतों की सृष्टि

चेतन वही ज्ञान संवाहक !

 

उस चेतन का ध्यान धरें हम

उसके हित ही उसे भजें हम,

जग ही माँगा यदि उससे भी

व्यर्थ रहेगा यह सारा श्रम !

 

उसके सिवा न कोई दूजा

इन श्वासों का वही प्रदाता,

प्रज्ञा, मेधा, धी उससे है

ज्ञान स्वरूप वही है ज्ञाता !

 

वही चेतना वही बोध है

उसका ही हो मन में चिंतन,

आनंद का स्रोत अजस्र है

स्फुरण सहज वही, वही स्पंदन !

 

तेरी महिमा तू ही जाने

मेधा में मणि जैसा दमके,

यही कामना है अंतर की

अपनी गरिमा में नित चमके !

 

सभी कारणों का वह कारण

खुद रहता है सदा अकारण,

सुंदर दुनिया एक रचायी

निज उजास का करने वितरण !

 

अहंकार कर जिस क्षण भूला

टूट गई वह डोर प्रीत की,

मन विवेक का थामे दामन

दुविधा छूटे हार-जीत की !

 

अविनाशी कण-कण में देखे

शाश्वत हर घटना के पीछे,

हर अंतर में छुपा पुरातन

मौन ध्यान में सहज निहारे ! 


बुधवार, अप्रैल 8

एक अनंत गगन है भीतर


एक अनंत गगन है भीतर

नाच उठे जो कैद है भीतर
खेल चल रहा कोई सुंदर,
एक ऊर्जा गाती प्रतिपल
एक ऊर्जा सुनती हर स्वर !

जीवन एक सुहृद मित्र सा
प्रतिक्षण ऊंचा ही ले जाता,
एक अनंत गगन है भीतर
फिर क्यों घर का आंगन भाता !

तोड़ के सारे झूठे बंधन
अभय प्राप्त यदि कर लेगा मन,
नई नई राहें खोजेगा
सहज उड़ान भरेगा चेतन ! 

शुक्रवार, दिसंबर 16

चेतन भीतर जो सोया है


चेतन भीतर जो सोया है

बीज आवरण को भेदता
धरती को भेदे ज्यों अंकुर,
चेतन भीतर जो सोया है
पुष्पित होने को है आतुर !

चट्टानों को काट उमड़ती
पाहन को तोड़े जल धार,
नदिया बहती ही जाती है
सागर से है गहरा प्यार !

ऐसे ही भीतर कोई है
युगों-युगों से बाट जोहता,
मुक्त गगन का आकांक्षी जो 
कौन है उसका मार्ग रोकता !

धरा विरोध करे न कोई
अंकुर को बढ़ने देती है,
पोषण देकर उसे जिलाती
मंजिल तक फिर ले जाती है

चट्टानें भी झुक जाती हैं
मिटने को तैयार सहर्ष,
राह बनातीं, सीढ़ी बनतीं
नहीं धारतीं जरा अमर्ष !

लेकिन हम ऐसे दीवाने
खुद के ही खिलाफ खड़े हैं,
अपनी ही मंजिल के पथ में
बन के बाधा सदा अड़े हैं ! 

जड़ पर बस चलता चेतन का
मन जड़ होने से है डरता,
पल भर यदि निष्क्रिय हो बैठे
चेतन भीतर से उभरता !

लेकिन इसको भय सताता
अपना आसन क्योंकर त्यागे,
जन्मों से जो सोता आया
कैसे आसानी से जागे !

दीवाना मन समझ न पाए
जिसको बाहर टोह रहा है,
भीतर बैठा वह प्रियतम भी
उसका रस्ता जोह रहा है !