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शुक्रवार, अप्रैल 18

केंद्र और परिधि

केंद्र और परिधि 


परिधि पर ही खड़ा हो कोई 

तो याद केंद्र की

भूले-भटके ही आती है 

मिल जाये जीवन का केंद्र 

तो परिधि फैलती चली जाती है !


परिधि से केंद्र पर जाना 

ऐसा ही है 

जैसे सतह से तल तक जाना 

सागर से कुछ मोती-माणिक 

 पा लेना 

टूटे शंख व सीपियाँ ही 

मिलती हैं सतह पर !


केंद्र पर पहुँचा हुआ 

लौट नहीं सकता 

उसी परिधि पर 

जहाँ से चला था 

वह अनंत हो जाती है 

भीतर-बाहर हर सीमा 

खो जाती है !


शुक्रवार, अप्रैल 4

भोर

भोर 


 

एक और सुबह 

लायी है अनंत संभावनाएँ 

उससे मिलने की 

अभीप्सा यदि तीव्र हो तो 

कृपा बरसती है अनायास 

खुल जाता है हर द्वार 

झरते हैं प्रकाश पुष्प हज़ार 

वही ज्योति बनेगी मार्गदर्शक 

जगमगा उठेगा कुछ ही देर में 

रवि किरणों से फ़लक 

जग जाएँगे वृक्ष, पर्वत, फूल सभी 

काली पड़ गई धूल सभी 

हर भोर उस सुबह की 

याद दिलाती है 

जिसमें जगकर आत्मा

 नयी हो जाती है !




गुरुवार, दिसंबर 19

स्वतंत्रता

स्वतंत्रता


मुक्त चेतना 

उड़ जाती है अनंत की ओर 

अब कल्पनाओं की दीवार 

आड़े नहीं आती 

भरभरा कर गिर जाती है 

जैसे हवा में उठा रेत का महल 

अंततः वह एक छाया ही तो है !

 

उस असीम को 

अनुभव करके ही 

होती है तृप्त 

अनायास ही चेतना !


पंछी के पैरों में ज़ंजीरें नहीं बंधी 

वह चाहे तो उड़ सकता है 

पिंजरा खुला है 

हर बंधन ढीला है 

एक भ्रम है 

 स्वतंत्र है हर आत्मा

स्वतंत्रता उसका 

जन्मसिद्ध अधिकार है !



रविवार, अक्टूबर 20

यात्रा

यात्रा 


मन के पार

एक अजाना लोक छिपा है 

 जहाँ से रह-रह कर 

आहट आती है शांति की 

गूँज सुनायी देती है 

किसी अन्य काल की 

यात्री को आगे बढ़ना है 

और आगे 

जिसने अनंत को चुन लिया 

फिर विश्राम कैसा 

स्वयं के अप्रतिम रूप से 

अपरिचय कैसा 

अपने घर लौटने में संकोच कैसा 

सहेजने में अपनी विरासत को 

गुरेज़ कैसा 

माँ के चरणों में बैठने से 

हम क्यों चूक जायें 

पिता के स्नेह पर हम क्यों न

अपना अधिकार जतायें 

जो शाश्वत है उससे क्यों न नाता जोड़ें 

माया में बंधकर ख़ुद से मुख मोड़ें 

अनमोल हीरे हमने छिपाये है 

व्यर्थ पत्थरों को ख़रीद लाये हैं 

जब जागो, तभी सवेरा है 

उस का तो लगता हर घड़ी फेरा है ! 



बुधवार, दिसंबर 6

क्यों दिल की साँकल उढ़का ली


क्यों दिल की साँकल उढ़का ली


भरें न कल्पना की उड़ानें 

कैसे नये क्षितिज पायेंगे ? 

नियत सोच में सिमटे रहकर 

बस पुरातन दोहरायेंगे !


जहाँ अनंत कपाट खुले हों 

कैसे कोई घर में बैठे, 

महासमंदर ठाँठे मारे 

क्यों न मुसाफ़िर गहरे पैठे !


पलकों में सपने तिरतें हों 

अंतर भरे उमंग उल्लास, 

अधरों पर हों गीत मिलन के 

जागा रहे पल-पल विश्वास !


दूरी नहीं जरा भी उससे 

जिसका पथ ये कदम ढूँढते, 

अहर्निशम् दीपक जलता है 

नयन मुँदे हों या हों जगते !


कोकिल और पपीहा प्यासे 

अब भी लगन जगे अंतर में, 

चातक तकता नील गगन को 

अब भी मोर नाचते वन में !


जीवन दे उपहार अनोखे 

अपनी ही झोली क्यों ख़ाली, 

सब दे कर भी कभी न चुकता

क्यों दिल की साँकल उढ़का ली ! 


बुधवार, अगस्त 16

जीवन - एक रहस्य

जीवन - एक रहस्य 



सब कुछ व्यवस्थित हो जीवन में 

नपा-तुला, मन के मुताबिक़ 

ऐसा कहाँ होता है ! 

अचानक घट जाता है कुछ 

भर जाता है जो अंतर में असंतोष 

परमात्मा हमें सुलाये रखना नहीं 

जगाये रखना चाहते हैं 

दो पैरों पर खड़े रहें सदा 

तकते आकाश को 

ऐसा उजकाये रखना चाहते हैं ! 

जीवन एक सीधी रेखा पर नहीं 

ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने का नाम है 

यहाँ रुक गया जो 

थक जाता है 

चलने वाले को ही विश्राम है !

अनंत है वह 

हम वही हैं यदि 

तो अनंत ही हमारी सीमा है 

सजग रहे अंतर, इसमें ही उसकी गरिमा है 

जो करणीय है 

वह करवा ही लेता है 

प्राप्य है जो दिला देता 

फिर कैसा द्वन्द्व और कैसा अभिमान 

जीवन एक रहस्य है 

लें ऐसा ही मान ! 


शुक्रवार, अगस्त 11

विभूति

विभूति 


सुना है तेरी मर्ज़ी के बिना 

पत्ता भी नहीं हिलता 

कोई चुनाव भी करता है 

तो तेरे ही नियमों के भीतर 

चाँद-तारे तेरे बनाये रास्तों पर 

भ्रमण करते 

नदियाँ जो मार्ग बदल लेतीं, कभी-कभी 

उसमें भी तेरी रजा है 

सुदूर पर्वतों पर फूलों की घाटियाँ उगें 

इसका निर्णय भला और कौन लेता है 

हिमशिखरों से ढके उत्तंग पर जो चमक है 

वह तेरी ही प्रभा है 

कोकिल का पंचम सुर या 

मोर के पंखों की कलाकृति 

सागरों की गहराई में जगमग करते मीन 

और जलीय जीव 

मानवों में प्रतिभा के नये-नये प्रतिमान 

तेरे सिवा कौन भर सकता है 

अनंत हैं तेरी विभूतियाँ 

हम बनें उनमें सहायक 

या फिर तेरी शक्तियों के वाहक 

ऐसी ही प्रार्थना है 

इस सुंदरता को जगायें स्वयं के भीतर 

यही कामना है ! 


सोमवार, जुलाई 3

सत्यं, शिवं, सुन्दरं सदगुरु

सत्यं, शिवं, सुन्दरं सदगुरु


एक बूँद में सागर भर दे 

जो अनंत को हमें थमा दे,

नाम खुमारी में तर कर दे 

घूँट-घूँट में अमिय पिला दे !


जो बंदे को खुदा बनाता, 

उर में शीतल स्थान दिला दे, 

द्वैत भावना मिटा हृदय से  

पल में अपना आप मिला दे !


आनन से प्रकाश बिखेरता 

अनुकम्पा बरबस  छलकाए, 

पल में राज खोल दे सारे

जीवन में जागरण जगाये !


जाने कौन देश का वासी, 

कहता दुनिया बदली जाए, 

सूक्ष्म लहर ज्यों भरी प्रेम से, 

रह-रह अपने निकट बुलाए !


सत्यं, शिवं, सुन्दरं सदगुरु, 

या फिर लीला उस ईश्वर की, 

आँखों ही आँखों में बोले, 

लगन लगा दे परमेश्वर की !


स्वयं जागा जगाने आता 

धर्म सहजता का बतलाये, 

पावनी दृष्टि एक डालकर, 

सेवा भाव परम भर जाये  !


गुरु पूर्णिमा पर्व अलबेला 

मिलना सूक्ष्म अदृश्य भाव का,

ख़ुद  से भी जो निकट बसा है , 

पा जाना उस निज स्वभाव का !


मंगलवार, मार्च 28

रामनवमी के पावन पर्व पर

रामनवमी के पावन पर्व पर 


त्रेता युग में प्रकट हुए थे 

 मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम,  

किन्तु आज भी अति ही पावन 

शुभ परम सात्विक जिनका नाम !


खुद अनंत को सांत बनाया 

अनुपम अवतार लिया विष्णु ने, 

किंतु रहे राम नहीं सीमित

भारत भू की सीमाओं में !


राम नाम के मधुर जाप ने 

सारे जग को गुंजाया है , 

हरि अनंत  कथा भी अनंता 

हर युग ने जिसे सुनाया है !


जन्मस्थल पर बनता मन्दिर 

दिव्य स्वप्न अब पूर्ण हुआ है,  

राम राज्य फिर लौटा लाएं   

 बाट देखता वर्तमान यह !


 शुभ मूल्यों की हो स्थापना

 राजाराम चले थे जिन पर,

दुनिया को नव मार्ग दिखाया  

सुत आदर्श, मित्र भाई बन  !


माँ सीता का नाम सदा ही  

वीर राम से आगे लगता,  

सहे कई अपवाद भले ही 

सिया-राम ही जग यह जपता !


शनिवार, दिसंबर 24

ज्योति कमल नित नए खिलाता

ज्योति कमल नित नए खिलाता


वह अनंत ही, सांत बना है 

भरमाता खुद को, माया से 

सत्य मान जो, भ्रमित हो गया 

डर जाता है, जो छाया से !


नित  प्रेम जो, मोह में फँसता

सदा शांत, पर द्वेष जगाए 

जीवन विमल अमृत सा बरसे, 

अनजाने में गरल बनाए !


सुख की चाह सदा भरमाती 

खुद से दूर चला जाता है, 

अपने भीतर भर भंडारे 

उर चिर तृषित  छला जाता है !


जो हल्का है लघु तिनके सा 

भारी भीषण हिम पर्वत सा, 

दूर अति नक्षत्र अनंत सा 

श्वासों से भी निकट बसा है !


जिसका होना वही जानता

बिरला कोई  ही लख पाता,

गुनगुन भँवरे सा गाता है 

ज्योति कमल नित नए खिलाता !