केंद्र और परिधि
परिधि पर ही खड़ा हो कोई
तो याद केंद्र की
भूले-भटके ही आती है
मिल जाये जीवन का केंद्र
तो परिधि फैलती चली जाती है !
परिधि से केंद्र पर जाना
ऐसा ही है
जैसे सतह से तल तक जाना
सागर से कुछ मोती-माणिक
पा लेना
टूटे शंख व सीपियाँ ही
मिलती हैं सतह पर !
केंद्र पर पहुँचा हुआ
लौट नहीं सकता
उसी परिधि पर
जहाँ से चला था
वह अनंत हो जाती है
भीतर-बाहर हर सीमा
खो जाती है !

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