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मंगलवार, अक्टूबर 20

गिरें खंडहर हर विकार के

विजयादशमी पर

 हार्दिक शुभकामनाएँ 


एक दशहरा ऐसा भी हो

जल जाए हर कलुष हृदय से,

अहंकार का मुकुट गिरे फिर

भूमि पर श्री राम के शर से !


राम आत्मा का सुशासन हो

धी सीता घर वापस आये,

सजग चेतना ज्योति बने फिर

दीवाली सा उर सज जाए !


मृत हो सारी पूर्व धारणा

पूर्वाग्रही कुंभकर्ण विहत,

अंधानुकरण हर विस्मृत हो

नित्य नवीन चेतना जागृत !


गिरें खंडहर हर विकार के

प्रलय बरसे नूतन सृष्टि हित,

आसक्ति, मोह डोर तोड़कर

उड़े गगन में मानव का चित !


क्रांति घटे हर घर आँगन में

भय के बादल छँटे गगन से,

नीरव विमल व्योम का दर्शन

शरद पूर्णिमा हर जीवन में !

 

शनिवार, अप्रैल 18

कितनी बार धरा पर आये


कितनी बार धरा पर आये

योग वशिष्ठ पर आधारित 

इस ब्रह्मांड में परम अनंत, एक बस रहा जानें इसको

राम ने छोटी सी आयु में, पहचाना इसी असलियत को !


मुक्त हुए थे अपने भीतर, राम स्वयं ही चिंतन करके 

गुरु वशिष्ठ ने ज्ञान दिया था, परम मोक्ष की व्याख्या करके ! 


जैसे किसी भी मरुभूमि में, कोई फसल नहीं उग सकती, 

ज्ञेय तत्व भी वहाँ न होता, जहाँ वैराग्य आग न जलती !


 प्राप्त हुए विश्रांति को राम, शोभा उनकी बहुत निखरती, 

ज्ञेय वस्तु मन में झलकेगी, जैसे दर्पण में छवि बनती ! 


जीव की बुद्धि में बढ़ता, जो हृदयकाश में कल्पित होता, 

बाद विनाश के परलोक की, जीव सदैव कल्पना करता !


पाँच भूत आदि सभी मिथ्या, किंतु उन्हें मन सत्य मानता, 

  महासागर यह अज्ञान का, अंतहीन प्रतीत है होता ! 


न जाने किस अनंत काल से, धार समय की बहती जाती, 

सृष्टि हुई, फिर प्रलय घटा है, बार-बार यही सृष्टि होती !


कितनी बार धरा पर आये, कितनी बार हँसे रोये हैं, 

जिसका यह अज्ञान मिटा है, उसने तृप्ति बीज बोए हैं !


सागर चाहे शांत हुआ हो, या उसमें तूफ़ान उठ रहे, 

दोनों में जल तो जल रहता, उसमें कोई भेद कब रहे?


देह सहित या देह बिना हो, अंतर एक जीव का रहता, 

हवा बह रही या प्रशांत हो, नाम उसका वायु ही रहता !


 विश्व में अनथक पुरुषार्थ से, प्राप्त हुआ करता है कुछ भी, 

मनसा, वाचा और कर्मणा, चाहोगे दृढ़ता से जो भी !


 क्या नहीं मिलता अभ्यास से, उद्योग सदा करना होगा 

शास्त्र वचनों के अनुसार ही, जीवन में श्रम करना होगा !

 

गुरुवार, नवंबर 13

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

२३ अक्तूबर २०२५

आज हम श्रीलंका में हैं। इस देश का नाम किस भारतीय ने नहीं सुना है? रामायण की कथा में रावण की स्वर्णमयी लंका का उल्लेख होता है, जिसे हनुमान ने जलाया था।जहाँ भगवान राम रामेश्वर से सेतु बनाकर पहुँचे थे और सीता मैया को लंकापति की क़ैद से छुड़ाया था। लगभग एक महीने पहले ही हमें श्रीलंका में होने वाली ‘रामायण यात्रा’ के बारे में जानकारी मिली थी। पूर्व में इस्कॉन से जुड़े श्री माधवानंद जी के साथ लगभग पचास लोगों के एक समूह के साथ हमने इस यात्रा में सम्मिलित होने का कार्यक्रम बनाया। सुबह सात बजे हम बैंगलुरु के कैंपागोड़ा हवाई अड्डे पर पहुँचे तो अन्य यात्री भी आ चुके थे। सभी को टिकट, वीज़ा तथा नाश्ते व लंच के लिए पैकेट्स दिये गये, पूरी यात्रा के दौरान अपने साथ रखने के लिए खाने-पीने का कुछ सामान अलग से दिया गया। इमिग्रेशन के बाद हम हवाई जहाज़ में पहुँचे तो मोर के पंखों की आकृतियों से सजे सुंदर परिधान पहने परिचारिकाओं ने ‘आई बुआन’ कहकर हमारा स्वागत किया।उनका परिधान साड़ी था, पर पहनने का तरीक़ा भिन्न था।एक घंटे की सुखद यात्रा में एक तमिल फ़िल्म का कुछ अंश देखा, जिसमें नायक हैदराबाद में कोचिंग के लिए आता है, पर नायिका को प्रभावित करने के लिए एक रेस्तराँ में काम पकड़ लेता है।पता नहीं आगे क्या हुआ होगा, पर हमारा गंतव्य आ गया था। कोलंबो हवाई अड्डे पर फूलों की माला से हमारा स्वागत हुआ तथा एक समूह चित्र भी लिया गया।यहीं पर सभी ने एक स्थानीय बैंक से अपनी आवश्यकता के अनुसार भारतीय रुपयों को श्री लंका रुपयों में बदला, एक भारतीय रुपया, सवा तीन श्री लंका रुपयों के बराबर है।  

दोपहर के भोजन के बाद श्रीलंका के दक्षिणी प्रांत गाल्ल की यात्रा आरंभ हुई। एसी बस सुविधाजनक थी। लगभग डेढ़ घंटे में हम गाल्ल पहुँच गये। गाल्ल के उनावटुना स्थान पर स्थित   रूमास्सला पर्वत को संजीवनी पर्वत के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब हनुमान जी हिमालय के द्रोणगिरी पर्वत से संजीवनी बूटी ला रहे थे, तब उस पर्वत का एक हिस्सा श्रीलंका के गाल्ल के पास रूमास्सला पर्वत के रूप में गिर गया था। इस पर्वत पर पाए जाने वाले पौधे श्रीलंका के अन्य हिस्सों में पाए जाने वाले पौधों से भिन्न हैं, जिसे स्थानीय लोग संजीवनी का अंश मानते हैं। 

संजीवनी पर्वत पर पवनपुत्र हनुमान की एक विशालकाय मूर्ति थी। जिसके चरणों पर कई वस्त्र बाँधे गये थे, शायद इस तरह यहाँ लोग मन्नत माँगते होंगे। मूर्ति एक चबूतरे पर स्थित थी, जिसपर सीढ़ियों से चढ़कर जाना था, हमारे समूह में अधिकतर वरिष्ठ नागरिक थे, पर सभी ने दर्शन किए और कई लोगों ने मूर्ति की परिक्रमा भी की। 

इसके बाद हम श्वेत रंग के एक भव्य शांति स्तूप को देखने गये। इस शांति स्तूप का निर्माण जापानी बौद्ध भिक्षु निचिदत्सु फ़ूजी द्वारा विश्व शांति के लिए किया गया है। द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले के बाद उन्होंने शांति के प्रतीक के रूप में दुनिया भर में अस्सी से अधिक शांति स्तूप बनवाये हैं। इस समय वहाँ यूक्रेन और रशिया के मध्य चल रहे युद्ध को रुकवाने के लिए प्रार्थना करने को कहा जा रहा था। युद्ध के भीषण परिणामों के बारे में आगाह भी किया गया था। हमने भगवान बुद्ध के जीवन की चार प्रमुख घटनाओं को चित्रित करती हुई चार विशालकाय मूर्तियों के दर्शन भी किए। 

यात्रा के दौरान अमर नामक स्थानीय गाइड श्रीलंका के बारे में कई जानकारियाँ देते जा रहे थे। सिंहली भाषा में नमस्ते को ‘आई बुआन’ कहा जाता है और धन्यवाद को ‘स्तुति’ ! श्रीलंका दक्षिण एशिया में हिन्द महासागर के उत्तरी भाग में स्थित एक द्वीप है, जिसे हिन्द महासागर का मोती या पूर्व का अन्न भण्डार कहा जाता है। भारत के दक्षिण में स्थित यह द्वीप देश भारत से मात्र इक्कतीस किलोमीटर की  दूरी पर स्थित है। कहा जाता है कि श्रीलंका में सवा लाख वर्ष पहले से मानव निवास करते थे। इसका इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है, जिसमें अनुराधापुर और पोलोन्नारुवा जैसे प्राचीन साम्राज्यों में सिंहली वंश का शासन था।ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में मौर्य सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा के आगमन के साथ यहाँ बौद्ध धर्म का आगमन हुआ। 

सोलहवीं शताब्दी में यहाँ पुर्तगालियों ने आक्रमण किया और बहुत सारे मंदिरों को तोड़ दिया, जिनकी मूर्तियाँ स्थानीय लोगों ने ज़मीन में अथवा पेड़ों के तनों में छिपाकर रख दीं और सैकड़ों वर्षों के बाद उन मंदिरों का पुनरुद्धार किया गया। 17वीं सदी में यहाँ डच आये और 1802 ईस्वी से अंग्रेजों ने इस पर शासन किया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अन्य कई देशों की तरह 4 फरवरी 1948 को श्रीलंका को भी अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिली।पहले इसका नाम सीलोन था, 1972 में देश एक गणराज्य बना और इसका नाम बदलकर लंका किया गया। 'श्रीलंका' नाम  1978 में अपनाया गया। पच्चीस वर्षों तक श्रीलंका में अल्प संख्यक तमिल और बहु संख्यक सिंहल जातीय समूहों के मध्य गृहयुद्ध चलता रहा, जो 19 मई 2009 को समाप्त हुआ। प्रशासकीय रूप से श्रीलंका नौ राज्यों में बंटा हुआ है। ये राज्य कैंडी, अनुराधापुर, जाफ़ना, त्त्रिंकोनमल्ली, कुरुनगल, गाल्ल, उवा, रतनपुर और कोलंबो हैं। इन प्रान्तों में कुल पच्चीस जिले हैं।

माधवानंद जी ने बताया, हिंदू पौराणिक इतिहास के अनुसार श्रीलंका को शिव ने बसाया था। भगवान शिव की आज्ञा से विश्वकर्मा देव ने पार्वती देवी के लिए यहाँ एक स्वर्ण महल बनाया था। ऋषि विश्रवा ने शिव से छल से लंका को माँग लिया था। पार्वती ने शाप दिया कि एक दिन शिव का अंश उस महल को जलायेगा। विश्रवा ने लंकापुरी अपने पुत्र कुबेर को दी, पर रावण ने उसे निकाल कर स्वयं को वहाँ का राजा बनाया। कुबेर रावण के सौतेले भाई थे। 

श्रीलंका के अंतर्राष्ट्रीय रामायण अनुसंधान केंद्र और पर्यटन मंत्रालय ने रामायण से जुड़े पचास स्थानों का पता लगाया है। जिनमें से कुछ अशोक वाटिका, राम-रावण युद्ध भूमि, रावण की गुफा, उसका महल आदि हैं। श्रीलंका में बौद्ध और हिंदू धर्म की साझा परंपरा रही है। शिव के पुत्र कार्तिकेय यहाँ के सबसे लोकप्रिय देवता हैं। इनकी पूजा न केवल तमिल करते हैं, बल्कि सिंहली व बौद्ध भी करते हैं। यात्रा प्रबंधक ने बताया, अगले छह दिनों में हमें पाँच विभिन्न स्थानों में रहना है। दिन भर घूमने के बाद शाम को होटल पहुँचना है और अगले दिन नाश्ते के बाद अगले स्थान के लिए रवाना होना है। उन्होंने रास्ते में रामायण से जुड़ी सुंदर कथाएँ सुनाते हुए महामंत्र का जाप व कीर्तन भी करवाया। उन्होंने बताया, हनुमान जी को द्रोणगिरी स्थित संजीवनी पर्वत पर दो बार जाना पड़ा था। एक बार श्री राम व लक्ष्मण दोनों अचेत हो गये थे, तब जाम्बवन्त ने उन्हें भेजा था। दूसरी बार वैद्य सुषेण ने केवल लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने को कहा था। हनुमान चार औषधियाँ लाये थे - विशल्य कर्णी, मृत संजीवनी, संधानी तथा सुवर्ण कर्णी। प्रयोग के बाद जिस स्थान पर औषधियाँ लायी गई थीं, वहीं आज संजीवनी पर्वत है। आज भी वहाँ कई जड़ी-बूटियाँ उगती हैं, जिन पर वैज्ञानिक शोध भी चल रहे हैं। एक किवदंती के अनुसार हनुमान ने बाद में वह शिखर उछाल दिया तो वह कंबोज देश में जाकर उल्टा गिरा।इतनी सारी जानकारी प्राप्त करते हुए हम शाम की चाय के लिए रुके। देर शाम को हम रिज़ौर्ट पहुँच गये। 


मंगलवार, मार्च 25

जो है


जो है 

जो है 

उसे देख नहीं सकते 

वह देखने वाला है !


जो दिखता है 

वह है नहीं 

क्योंकि वह 

पल-पल बदल रहा है !


जो है 

वह सदा है 

पर अनजाना ही 

रह जाता है !


जो नहीं है 

उसी को पकड़ने में 

मन ऊर्जा गँवाता है !


जीवन इसी विरोधाभास 

का दूसरा नाम है !


जो है 

उसी को कहते राम हैं 

जिसमें ठहर कर 

मन पाता विश्राम है !


बुधवार, जनवरी 15

राम में विश्राम या विश्राम में राम

राम में विश्राम या विश्राम में राम


भीग जाता है अंतर 

जब उस एक के साथ एक हो जाता है 

समाप्त हो जाती है 

कुछ होने, पाने, बनने की दौड़ 

जब हर साध उठने से पहले ही 

हो जाती है पूर्ण 

कुछ होने में अहंकार है 

कुछ न होने में आत्मा 

कुछ पाने में भय है खो जाने का 

छोड़ने में आनंद 

कुछ बनने में श्रम है 

 जो हैं उसमें विश्राम 

और विश्राम में है राम 

तब राम ही मार्ग दिखाते हैं 

पथ जीवन का सुझाते हैं 

ध्यान में मिलते 

जीवन में संग उन्हें पाते हैं 

संत जन इसी लिए एक-दूजे को 

‘राम राम जी’ कहकर बुलाते हैं ! 


सोमवार, जून 10

सभी दलों से देश बड़ा है

सभी दलों से देश बड़ा है 


लोकतंत्र की विजय हुई है 

हारे-जीततें होंगे लोग, 

देश समन्वय के रस्ते  पर 

आश्वासित हुए सारे लोग !


तय कर दिया चुनावों ने यह 

राजनीति से बड़े हैं राम,  

मिल-जुल कर ही बढ़ना आगे 

संविधान का यही  पैग़ाम !


सभी दलों से देश बड़ा है 

सेवा का जो अवसर देता, 

सरकारें आये जायेंगी 

युगों-युगों से भारत माता !


शुक्रवार, जून 7

एक कतरा प्रेम

एक कतरा प्रेम 


बचपन में हम झगड़ते हैं 

यौवन में कुछ न कुछ पकड़ते हैं 

वह तो बाद में पता चलता है 

हक़ीक़त में जिसकी तलाश है 

वह न झगड़ने से मिलती है

 न पकड़ने से !


वह तो हवाओं में 

झूमने की कला है !


बारिश में भीगने 

आँखों से बतियाने 

हाथ में हाथ डाले 

हरी घास पर 

डोलने में हर बार 

भीतर कुछ पला है !


जो न था पास, जब

कई अपने पीछे छूट गये 

कुछ सपने बेवजह ही टूट गये !

 

सत्य है राम का नाम

 सुना न जाने कितनी ही बार 

 पर क्यों फुला लिया मुँह 

जब आये थे राम प्रेम बनकर

जीवन पथ पर  राह दिखाने !


जिस प्रेम का एक कतरा भी 

छू जाये मन को  

तो गूँजने लगते हैं मीठे तराने !


उस एक के लिए ही 

हर झगड़ना था शायद 

उसे ही पकड़ना था 

अब जाना है राज दिल ने 

यूँ ही ‘मैं’ का वह अकड़ना था  !




मंगलवार, फ़रवरी 13

दूर हुए पर हृदय निकट थे


दूर हुए पर हृदय निकट थे

​​

सिया-राम के मध्य बहा जो प्रेम भरा दरिया अपार था, दूर हुए पर हृदय निकट थे कान्हा-राधिका में प्यार था ! सत्यवान संग जा यमलोक सावित्री की प्रीत अनोखी, महल-दुमहले तज कर निकली नहीं भक्त मीरा सी देखी ! ऐसे ऊँचे मानदंड हों प्रेम दिवस तभी मने सार्थक, मृत्यु भी न विछोह कर पाये ऐसा हो उर अमर समर्पण !


रविवार, जनवरी 21

राम

 राम 

एक शब्द नहीं है राम 

न ही कोई विचार 

बाल्मीकि के मन का 

भाव जगत की वस्तु भी 

नहीं है तुलसी के 

परे है हर शब्द, भाव व विचार से 

एक अमूर्त, निराकार 

जिसने भर दिया है 

उत्साह और उमंग 

शांति और आनंद 

ख़ुशी कोई विचार तो नहीं 

एक अहसास है 

वैसे ही राम उनके हैं 

जो महसूस करते उन्हें 

अपने आसपास हैं 

हर घड़ी हर मुहूर्त से परे 

वे सदा थे सदा हैं 

वे प्रतिष्ठित हैं 

हमें इसका अहसास करना है 

राममंदिर में विराजित 

राम लला की मूरत में

ह्रदय के 

विश्वास और श्रद्धा का 

रंग भरना है ! 



सोमवार, जनवरी 15

पुनः अयोध्या लौटते राम

पुनः अयोध्या लौटते  राम

सारे भूमण्डल में फैली 

रामगाथा में बसते राम, 

जन्मे चैत्र शुक्ल नवमी को

मर्यादा हर सिखाते राम !


पैरों में पैजनियां पहने 

घुटनों-घुटनों घूमते  राम, 

माँ हाथों में लिए कटोरी

आगे आगे दौड़ते  राम !


गुरुकुल में आंगन बुहारते 

गुरू चरणों में झुकते राम, 

भाइयों व मित्रों को पहले 

निज हाथों से खिलाते राम !


ताड़का सुबाहु विनाश किया 

 यज्ञ की रक्षा करते राम, 

शिव का धनुष सहज ही तोडा 

जनक सुता को वर रहे  राम !


जन-जन के दुःख दर्द को सुन 

अयोध्या को संवारें राम, 

राजा उन्हें बनाना चाहें  

पिता नयनों के तारे राम !


माँ की इच्छा  पूरी करने  

जंगल-जंगल घूमते राम, 

सीता की हर ख़ुशी चाहते 

हिरन के पीछे जाते राम !


जटायु को गोदी में लेकर 

आँसूं बहाते व्याकुल राम, 

खग, मृग, वृक्षों, बेल लता से 

प्रिया का पता पूछते राम !


शबरी के जूठे बेरों को 

अतीव स्वाद ले खाते राम, 

महावीर को गले लगाते 

सुग्रीव मित्र बनाते राम !


छुप कर तीर बालि को मारा 

दुष्टदलन सदा  करते राम, 

महावीर  को दी अंगूठी 

स्मरण  सिया  नित्य  करते राम !


सागर पर नव  सेतु बनाया 

शिव की अर्चना  करते राम, 

असुरों का विनाश कर लौटे 

पुनः अयोध्या लौटते  राम !