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बुधवार, अक्टूबर 9

रेत पर टिकते नहीं घर

रेत पर टिकते नहीं घर

​​

स्वप्न ही तो है जगत यह 

टूटना नियति है इसकी, 

सत्य मानो या सहेजो 

छूटना फ़ितरत इसी की ! 


आँख भरकर देख लो बस 

मुस्कुरा लो साथ मिलकर, 

किंतु न बाँधो उम्मीदें 

रेत पर टिकते नहीं घर !


ओस की इक बूँद हो ज्यों 

है यही सौंदर्य इसका, 

गगन में रंगों का मेल 

नदी में ज्यों बहे धारा !


प्रीत की जो बेल बोई 

वह सदा उसके लिए है, 

भ्रम हुआ जब जगत चाहा 

शाश्वत सदा अप्रगट है !


जगत माला में पिरोया 

स्वयं बनकर पूर्ण आया, 

स्वयं को ही देखते हम 

स्वप्न का लेते सहारा !


बुधवार, मार्च 13

जीवन

जीवन 

इतनी शिद्दत से जीना होगा 

जैसे फूट पडती है कोंपल कोई

सीमेंट की परत को भेदकर,

ऊर्जा बही चली आती है जलधार में

चीर कर सीना पर्वतों का 

या उमड़-घुमड़ बरसती है 

बदली सावन की !


न कि किसी जलते-बुझते 

दीप की मानिंद 

या अलसायी सी 

छिछली नदी की तरह पड़े रहें

 और बीत जाये जीवन... का यह क्रम

लिए जाए मृत्यु के द्वार पर

 खड़े होना पड़े सिर झुकाए

देवता के चरणों में चढ़ाने लायक

फूल तो बनना ही होगा

इतनी शिद्दत से जीना होगा…!


शुक्रवार, अगस्त 11

विभूति

विभूति 


सुना है तेरी मर्ज़ी के बिना 

पत्ता भी नहीं हिलता 

कोई चुनाव भी करता है 

तो तेरे ही नियमों के भीतर 

चाँद-तारे तेरे बनाये रास्तों पर 

भ्रमण करते 

नदियाँ जो मार्ग बदल लेतीं, कभी-कभी 

उसमें भी तेरी रजा है 

सुदूर पर्वतों पर फूलों की घाटियाँ उगें 

इसका निर्णय भला और कौन लेता है 

हिमशिखरों से ढके उत्तंग पर जो चमक है 

वह तेरी ही प्रभा है 

कोकिल का पंचम सुर या 

मोर के पंखों की कलाकृति 

सागरों की गहराई में जगमग करते मीन 

और जलीय जीव 

मानवों में प्रतिभा के नये-नये प्रतिमान 

तेरे सिवा कौन भर सकता है 

अनंत हैं तेरी विभूतियाँ 

हम बनें उनमें सहायक 

या फिर तेरी शक्तियों के वाहक 

ऐसी ही प्रार्थना है 

इस सुंदरता को जगायें स्वयं के भीतर 

यही कामना है ! 


शनिवार, जुलाई 22

ऐसा एक मिलन था अद्भुत


ऐसा एक मिलन था अद्भुत

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,

बरसों पहले घर में परिवार के सभी लोग इक्कट्ठे हुए, जब एक कुनबा एक साथ होता है तो कई नई यादें मनों में घर कर लेती हैं भविष्य में आने वाली पीढ़ियों तक वह यादें किसी न किसी तरह पहुँच जाती हैं. कुछ यादें मैंने इस कविता में उतारी थीं, इसे पढ़कर शायद आपको भी अपने परिवार के मिलन की कोई  स्मृति हो आये...

कई बरस के बाद मिले थे

ह्रदय सभी के बहुत खिले थे,

इक छत के नीचे वे चौदह

चले बातों के सिलसिले थे !


दिवस सुहाने, माह नवम्बर

न ही गर्मी न सर्दी का डर,

कारण पापा की बीमारी

लेकिन खुश वे, उन्हें देखकर !


वाराणसी से डिब्रूगढ़ का

राजधानी में सफर चला,

मुम्बई से उड़े विमान में

फिर असम भूमि का दर्श मिला !


सँग लाए वे भेटें अनुपम

मिठाई का पूरा भंडार,

दीवाली के बाद मिले थे

मीठा मीठा करें व्यवहार !


मलाई गिलौरी, गोंद-पाक 

बूंदी चूर, बरफ़ी अनगिन

मेवों, सेव से बने व्यंजन

खाए मिलजुल सबने हरदिन !


वजन बढ़ा या घटा औंस भर

नापा करते बारी बारी,

अभी नाश्ता समाप्त हुआ न

दोपहरी की हो तैयारी !


फिर बारी भ्रमण  की आती

दो वाहनों  में सभी समाते,

रोज नापते असम की धरती

चाय बागानों में जाते !


नदी किनारे, पुल के ऊपर

पार्क के झूले मन मोहते

पंछी, धूप, हवा, पानी सँग

हरी घास पर सभी झूमते !


ओ सी एस में इक अजूबा

पानी में थी लपट अग्नि की,

देख सभी रह गए अचम्भित

साँसें  सबकी रह गयी रुकीं !


बच्चों ने भी लीं तस्वीरें

मन में यादें भरीं सुनहरी,

दो सौ तेरह में सोये सब

दो सौ सात में की दुपहरी !


मिलकर उनो व कैरम खेला

झूले में भी पींग बढाई,

पौधों को नहलाया जल से

ग्रुप में फोटो खूब खिचाई !


मोनोपली का खेला खेल  

 सभी थे हाज़िर फेसबुक पर  ,

एक जगत जो यह दिखता है 

​​दूसरा आभासी  स्क्रीन  पर  I


मेलजोल से हर दिन बीता

खुशियाँ जैसे झलक रहीं थीं,

योग, प्राणायाम के बल पे

सेहत सबकी ठीक रही थी !


ऐसा एक मिलन था अद्भुत

कविता में जो व्यक्त हुआ है ,

सभी दिलों में जो अंकित है

बड़े प्रेम से खुदा हुआ है !


इसी तरह का प्यार सदा ही

सबके मन में बसा रहेगा 

पापा-माँ की मिलें दुआएं

जीवन सुंदर सदा रहेगा  !!





गुरुवार, जुलाई 28

जाग कर देखें जरा

जाग कर देखें जरा 


कैद पाखी क्यों रहे 

जब आसमां उड़ने को है,

सर्द आहें क्यों भरे 

नव गीत जब रचने को है !


सामने बहती नदी 

भला ताल बन कर क्यों पलें,

छांव शीतल जब मिली 

घनी धूप बन कर क्यों जलें !


क्षुद्र की क्यों मांग जब

महा उच्च सम्मुख हो खड़ा,

क्यों न बन दरिया बहे 

भरा प्रेम भीतर है बड़ा !


तौलने को पर मिले 

प्रतिद्वंद्विता उर क्यों भरें,

आस्था की राह पर 

शुभ मंजिलें नई तय करें !


 धुन सदा इक गूंजती  

वहाँ शोर से क्यों जग भरें,

छू रहा हर पल हमें 

पीड़ा विरहन की क्यों सहें !


जाग कर देखें जरा 

हर ओर उसकी सुलभ छटा,

प्राण बन कर साथ जो 

 भिगो मन गया बन कर घटा !


 रूप के पीछे छिपा 

सदा प्राप्य अपना हो वही,

 नाम में सबके बसा   

वही नाम जिसका है नहीं !


मंगलवार, सितंबर 7

प्रेम उस के घर से आया

प्रेम उस के घर से आया 


बन उजाला, चाँदनी भी 

इस धरा की और धाया


वृक्ष हँसते कुसुम बरसा

कभी देते सघन छाया 


नीर बन बरसे गगन से  

लहर में गति बन समाया


तृषित उर की प्यास बुझती 

सरस जीवन लहलहाया 


खिलखिलाती नदी बहती 

प्रेम उसकी खबर लाया 


मीत बनते प्रीत सजती 

गोद में शिशु मुस्कुराया 



 

शुक्रवार, जून 18

प्रकृति के कुछ रंग

प्रकृति के कुछ रंग

अपने–अपने घरों में कैद

खुद से बतियाते

अपने इर्दगिर्द ब्रह्मांड रचने वाले लोग

क्या जानें कि नदी क्यों बहती है

दूर बीहड़ रास्तों से आ

ठंडे पानी को अपने अंक में समेटे

तटों को भिगोती, धरा को ठंडक

पहुंचाती चली जाती है

क्यों सूरज बालू को सतरंगी बनाता

नदी की गोद से उछल कर शाम ढले उसी में सो जाता है

आकाश झांकता निज प्रतिबिम्ब देखने

संवारते नदी के शीशे में वृक्ष भी अपना अक्स

सदियों से सर्द हुआ मन

धूप की गर्माहट पा पिघल कर

बहने लगता है नदी की धारा के साथ

बर्फ की चादर से ढका धरा का कोना

जैसे सुगबुगा कर खोल दे अपनी आँखें

नन्हे नन्हे पौधों की शक्ल में

मन की बंजर धरती पर भी गुनगुनी धूप

की गर्माहट पाकर गीतों के पौधों उग आते

हल्की सी सर्द हवा का झोंका घास को लहराता हुआ सा

जब निकल जाये

तो गीतों के पंछी मन के आंगन से उड़कर

नदी के साथ समुन्दर तक चले जाते

धूप की चादर उतार, शाम की ओढ़नी नदी ओढ़े जब

सिमट आयें अपने-अपने बिछौनों में

अगली सुबह का इंतजार करते कुछ स्वप्न !

 

सोमवार, अप्रैल 12

नदी और जीवन

नदी और जीवन 


नदी ढूंढ लेती है अपना मार्ग 

सुदूर पर्वतों से निकल 

हजारों किलोमीटर की यात्रा कर 

बिना किसी नक्शे की सहायता के 

और पहुँच जाती है 

एक दिन सागर तक 

नदी अनवरत बहती है 

कभी दौड़ती हुई 

कभी मंथर 

समतल धरा पर थोड़ा विश्राम 

लेती होती है प्रतीत 

पर भीतर-भीतर गतिमान है 

नदी एक जीवन की तरह है 

जीवन जो कभी टकराता है 

बाधाओं रूपी चट्टानों से 

कभी सिमट जाता है कन्दराओं में  

अंधेरी सीलन भरी 

पा जाता है कभी खुला मार्ग 

दूर तक सपाट और कभी ढलान

 जिस पर फिसलता जाता है 

पर हर जीवन भी एक न एक दिन 

पा लेता है गंतव्य 

चाहे हजारों जन्म लेने पड़ें 

हर दो जन्मों के मध्य कुछ आगे बढ़ता है !

कभी विकारों की दलदल में फँसता है 

कभी द्वेष के रेगिस्तानों में झुलस जाता है 

फिर किसी जन्म में शीतल छाँव मिलती है 

दोनों तटों पर घने वृक्षों की 

तो एक दिशा पा लेता है  

 संयम और विश्वास के तटों के मध्य बहता हुआ 

पहुँच जाता है अनंत में 

जल जो मुक्त हुआ था सागर से वाष्प बनकर 

वही तो हिम शिलाओं पर बरस कर 

दौड़ता है पुनः अपने घर की ओर 

जीवन जो प्रकटा है अनंत से 

वही तो पुनर्मिलन चाहता है 

घर जाना है दोनों को 

वही पूर्ण विश्राम है 

उसी में छिपा राम है !