जग इक अनुभव
उर की सरिता बहती जाये
सागर से यह कहती जाये,
तेरा-मेरा साथ पुराना
तुझसे हुई, तू ही बुलाये !
आना सुख था, जाना भी है
किया पसार, समेट रही अब,
जग इक अनुभव, कब यह दुख है?
बिखरे सूत्र लपेट रही अब !
विमल दृष्टि दे सृष्टि मनोहर
देव सहायक नित सुखदायक,
भर जाती जब तुष्टि ह्रदय में
बनती समर्थ आत्मा नायक !

कम शब्दों में गहरी बात कह दी है आपने
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार आपका!
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 02 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार दिग्विजय जी!
हटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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