शनिवार, अप्रैल 11

हल्का होकर उड़े गगन में

हल्का होकर उड़े गगन में 


ख़ुदबुद करती रही चेतना 

धक-धक करता रहा हृदय यह,

उठतीं-गिरती रहतीं लहरें 

लिप्सा कभी, कभी छाया भय !


कितनी चट्टानें थीं भारी 

रस्तों में पावन सलिला के,

राह बनाती उन्हें तोड़ती 

ठुक-ठुक चलती थी अंतर में !


जब अतीत के गट्ठर फेंके 

हल्का होकर उड़े गगन में, 

  फैला था दूर तक सेहरा

मीलों तक थे फूल चमन में !


किसे बिठायें, किसे विदा दें 

मानव को ही तय करना है।

दस्यु घूमते अफ़वाहों के 

दिल का द्वार भिड़ा रखना है !


1 टिप्पणी:

  1. दस्यु घूमते अफ़वाहों के, दिल का द्वार भिड़ा रखना है। सच्ची बात कह दी आपने। आभार एवं अभिनंदन।

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