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गुरुवार, जुलाई 23

भय केवल मन की छाया है

भय केवल मन की छाया है


अनजाने रस्तों पर चलते 

भय का कंपन भीतर उठता, 

किंतु उसे रोक नहीं पाये  

जो मन आगे-आगे बढ़ता !


हो अपार गगन जहाँ सम्मुख 

मार्ग स्वयं ही खुलता जाता, 

भय बनकर तो मात्र ह्रदय का 

अंधकार ही जलता जाता ! 


हो भयभीत न पीछे मुड़ना 

सदा स्वर्ण को तपना पड़ता, 

हर इक लपट निखारे जाती 

 अंतर ओज ही साहस बनता !


भय केवल मन की छाया है 

तोड़ सके कब संबल उर का, 

सच पल भर को ढक भी जाये 

संग अनंत जागरण नभ सा !


माना सच का मार्ग संकरा 

अनजाना औ' ऊँचा-नीचा, 

एक-एक पग आगे धरते   

भय के पार चले ही जाना ! 


भय मात्र आवरण बन सकता  

किंतु नहीं दीवार बन सके, 

कँपते कदमों से भी पथ पर 

पा लेता हर लक्ष्य, जो चले !

 

शनिवार, अप्रैल 11

हल्का होकर उड़े गगन में

हल्का होकर उड़े गगन में 


ख़ुदबुद करती रही चेतना 

धक-धक करता रहा हृदय यह,

उठतीं-गिरती रहतीं लहरें 

लिप्सा कभी, कभी छाया भय !


कितनी चट्टानें थीं भारी 

रस्तों में पावन सलिला के,

राह बनाती उन्हें तोड़ती 

ठुक-ठुक चलती थी अंतर में !


जब अतीत के गट्ठर फेंके 

हल्का होकर उड़े गगन में, 

  फैला था दूर तक सेहरा

मीलों तक थे फूल चमन में !


किसे बिठायें, किसे विदा दें 

मानव को ही तय करना है।

दस्यु घूमते अफ़वाहों के 

दिल का द्वार भिड़ा रखना है !


शुक्रवार, नवंबर 7

अँधेरा और प्रकाश

अँधेरा और प्रकाश  


अंधेरे में बदल जाती हैं चीजें 

जो है 

वह नहीं दिखायी देता 

जो नहीं है 

वह नयी शक्लें धर लेता है 

अंधेरा भय जगाता है 

अंधेरा बाहर का हो या भीतर का 

परिणाम वही रहता है 

देख सके जो पार अंधेरे के 

ऐसी आँख जगानी है 

प्रकाश की एक नन्ही सी किरण 

उस पार से लानी है 

कितना भी बड़ा हो अँधेरा 

मिट जाएगा 

शांति और मौन की तरह 

छुपा प्रकाश बाहर आयेगा 

तब ज्ञात होगा

जो है 

वही तो प्रकट हो रहा है 

भीतर अज्ञान है 

तो मोह, क्रोध और भय की बेलें पनपेंगी 

कभी शोक सताएगा 

कभी घेर लेगा विषाद 

भीतर ज्ञान है 

तो आनंद की फसल लहलहायेगी !

किंतु जो मूल में है 

अंततः वही बच जाता है 

जो ओढ़ा हुआ है 

वह एक न एक दिन

 झर जाता है  

ओढ़ा हुआ अज्ञान 

भी उतर जाएगा 

और उस दिन 

जीवन पूरी तरह मुस्कुरायेगा !

बुधवार, अक्टूबर 22

जीवन एक सुवास अनोखी

जीवन एक सुवास अनोखी 

ह्रदय शुद्ध हो 
भाव विमल हों 
मन भी खाली-खाली अपना 

जीवन जैसे कोई लीला 
या फिर भोर काल का सपना !

चाह न जागे
 लौ जब लागे  
अंतर चरणों पर झुक जाये 

जीवन जैसे गीत खुशी का 
या कान्हा की बंसी  गाये !

जो जैसा है 
वैसा ही हो 
मनस  से हर द्वन्द्व मिट जाये 

जीवन एक सुवास अनोखी 
पल-पल अपना साथ निभाये !

 भय कैसा अब
कैसी उलझन 
चला रहा है वह जग सारा 

जीवन इक उपहार अनोखा 
नित्य  नूतन राज खुल जाता !

कभी धूप है 
कभी बदरिया 
बदल रहा नित मौसम बाहर 

जीवन इकरस पलता भीतर
बिछी हो ज्यों फूल की चादर !

शांति बरसती 
कृपा बह रही 
जिस पल द्वार ह्रदय का खुलता

जीवन जैसे मधुर पहेली 
हौले-हौले अंतर खिलता !
 

मंगलवार, जुलाई 22

सत्य और भ्रम

सत्य और भ्रम 


माना कदम-कदम पर बाधायें हैं 

मोटी-मोटी रस्सियों से अवरुद्ध है पथ

आसक्ति के जालों में क़ैद 

मन आदमी का 

न जाने कितने भयों से है ग्रस्त  

 जो प्रकट हो जाते हैं स्वप्नों में 

ज्ञान की तलवार से काटना होगा 

रस्सी कितनी भी मोटी हो 

एक भ्रम है 

सत्य सूर्य सा चमक रहा है 

समाधि के क्षणों में 

उसे मन में उतारना होगा 

हर भय से मुक्ति पाकर ?

नहीं, सत्य में जागकर 

स्वयं को पाना होगा !


मंगलवार, नवंबर 5

अस्तित्त्व और हम

अस्तित्त्व और हम 


जब सौंप दिया है स्वयं को 

अस्तित्त्व के हाथों में 

तब भय कैसा ?

जब चल पड़े हैं 

कदम उस पथ पर

उस तक जाता है जो 

तो संशय कैसा  ?

जब बो दिया है बीज प्रेम का  

अंतर में उसने ही 

तो उसके खिलने में देरी कैसी  ?

जब भीतर उतर आये हैं 

शांति के कैलाश 

तो गंगा के अवतरण पर 

भीगने से संकोच कैसा  ?

अपना अधिकार लेने में

 यह झिझक क्यों है 

हम उसी के हैं, और वही 

हम बनकर जगत में आया है 

जब जान लिया है या सत्य 

तब यह नाटक कैसा  ?

उसी को खिलने दो 

बढ़ने दो 

कहने दो 

अब अपनी बात चलाने का 

यह आग्रह कैसा  ?

डूब जाओ 

उसके असीम प्रेम में 

किसी तरह 

वह यही तो चाहता है 

फिर उससे भिन्न होने का 

भ्रम कैसा ? 


गुरुवार, जनवरी 26

समता की इक ढाल बना लें

समता की इक ढाल बना लें  


पुष्पों का मृदु हार बनें हम  

काँटों का चुभता ताज नहीं,

प्रीत सुरभि  हर सूं  बिखरायें  

उर बजे शोक का साज नहीं !


दुनिया आँख खोलकर देखें 

झर-झर अमिय निर्झरित होता,

समता की इक ढाल बना लें 

नादां  मन गर कंपित होता !


जीवन अभेद, जीवन अछेद्य

जग को अपना मीत बनायें, 

ले शिव-शक्ति का सदा आश्रय 

 कण-कण में उमंग बिखरायें ! 


अनदेखे  हर  बंधन छूटें 

मेरा-तेरा का महा बंध,  

कुछ भी नहीं, या हमीं सब कुछ  

फिर कैसा यह अंतरद्वंद्व !


हर मरीचिका छलना ही है  

छायाओं से कैसा डरना,  

भय की बेड़ी से जग बाँधे

उस प्रियतम से जुड़कर रहना  !


गुरुवार, अक्टूबर 13

अभय



अभय 


सूरज की एक किरण 

सागर की एक बून्द 

सारी पृथ्वी की धूल का एक कण 

अनंत ध्वनियों में एक स्वर 

हम वही हैं 

पर जब जुड़े हैं स्रोत से 

तो कोई भय नहीं !


रविवार, अगस्त 1

टूटी अंतर की हर कारा

टूटी अंतर की हर कारा 

जिस क्षण तजा प्रमाद मनस ने 
एक उमंग सहज भर जाती, 
कुछ पाने की मिटी चाह जब 
हर दुविधा भी संग मर जाती !

लोभ-लाभ की भाषा भूली 
प्रतिद्वंद, स्पर्धा भी छूटे, 
चित्त उदार बनेगा, उस क्षण 
आनंद घट हृदय में फूटे !

कंपित था भयभीत हुआ मन 
खो जाए ना प्रेम किसी क्षण, 
अभय मिला बाँटा भी सबको 
शुभ  का निर्झर फूटा उर में !

भय की इक चट्टान पड़ी थी 
रोक रही थी प्रेमिल धारा, 
 राह उसी की चला दो कदम 
टूटी अंतर की हर कारा !

दुःख के बादल सदा घिरे थे 
सुख का सूरज कब दिखता था, 
जब से झुका हृदय चरणों पर 
मिटा विषाद अमोद बहा था !


मंगलवार, अप्रैल 6

कोरोना काल

कोरोना काल 

यह भय का दौर है 

आदमी डर रहा है आदमी से 

गले मिलना तो दूर की बात है 

डर लगता है अब तो हाथ मिलाने से 

 घर जाना तो छूट ही गया था

 पहले भी अ..तिथि बन  

अब तो बाहर मिलने से भी कतराता है 

एक वायरस ने बदल दिए हैं सारे समीकरण 

दूरी बनी रहे किसी तरह 

इसका ही बढ़ रहा है चलन 

डरा हुआ आदमी हर बात मान लेता है 

बिना बुखार के भी गोली फांक लेता है 

सौ बार धोता है हाथ 

नकाब पहन लेता है 

वरना एक को हुआ जुकाम तो 

सारा घर कैदी हो जाता है 

घर में अजनबी बन जाते हैं लोग अब 

दूसरे कमरे में बैठी 

माँ मानो चली गई हो दूसरे गाँव 

इस डर ने छीन ली है आजादी 

छीन ली है खुले बरगद की छाँव 

 दौर ही ऐसा है 

यह डरने और डराने का

यहाँ बस काम से काम रखना 

किसी की ओर नजर भी नहीं उठाने का ! 


 

सोमवार, मार्च 15

मानव में खुद छुपा चितेरा

मानव में खुद छुपा चितेरा 


महायज्ञ सृष्टि का अनोखा 

शुभ पंचतत्व आहुति देते,

इक-दूजे में हुए समाहित   

रूप अनेकों फिर धर लेते !


जल में पावक, वायु गगन में 

भू  में रहते सभी समाए, 

भव्य महान प्रपंच रचा है 

पंछी,पशु, प्राणी जनमाये !


मानव में खुद छुपा चितेरा 

जिसने रच डाला यह आलम, 

उसके द्वारा भी करवाता 

बड़े-बड़े अनगिन  आयोजन !


सिर पर छप्पर, अन्न क्षुधा हित 

शिक्षा और स्वास्थ्य के साधन,  

कोई भय से न कंपता हो 

हर कोई पाए अपनापन  !


तन-मन स्वस्थ बनें जन-जन के 

यही परम का इक सपना है  , 

है सामर्थ्यवान जो जग में 

औरों का दुख ही हरना  है !


निज की खातिर बहुत जी लिए 

अब औरों हित जीना सीखें, 

जगती के इस महा हवन में 

स्वयं पावन आहुति सौंपें !

 

गुरुवार, नवंबर 5

समय या भ्रम

समय या भ्रम

 


समय जो निरंतर गतिमान है

क्या वाकई गति करता है?

या घटनाएं ही ऐसा प्रतीत कराती हैं

दिन और रात

माह और वर्ष

जन्म और मृत्यु

के मध्य समय बहता सा लगता है

 पर देखने वाला सदा एक सा रहता है !

रेत पर धँसे पाँव ज्यों

कहीं जाते से प्रतीत होते हैं

लहर आकर चली जाती है

वे वहीं के वहीं रहते हैं !

इतिहास बनता रहता है

व्यक्ति वही रहता है

कभी भयभीत, कभी निर्भीक,

कभी शोषक अथवा कभी शोषित

महामारी फिर-फिर दोहराती है

युद्ध भी लड़े जाते हैं बार-बार

जो भी बदलता है वह भ्रम ही सिद्ध होता है

एक पर्दा है जैसे जिस पर

घट रहा है सब कुछ

शायद गहराई में हर मन जानता है

यह एक दोहराया जाने वाला खेल है

 और वह इसमें व्यर्थ ही फंस गया है

सदा से है वह यहीं

वह कहीं गया ही नहीं

सारा भय ऊपर-ऊपर है

विचार में या भावना में

कुछ छूट जाने का भय

कुछ न कर पाने का भय

मारे जाने का भय

जो कंपता है वह प्रतिबिंब है

चाँद को कुछ नहीं होता

मछली के जाल में वह कभी फंसा ही नहीं

बस मान लिया है

सारा समय इस एक क्षण में समाया है

शेष सब..  कुछ छाया और कुछ माया है !