शनिवार, अप्रैल 25

नई मंजिलें राह देखतीं

नई मंजिलें राह देखतीं

 

जाने कहाँ-कहाँ से आते 

मन दिन-रात गुना करता है,

कई विचारों के गालीचे

यह दिन-रात बुना करता है !

 

सोये-सोये जन्मों बीते ,

 अब तो जगे भाग्य जो खोया, 

वही मिलेगा इस जीवन में 

जो कुछ कल हमने था बोया!

 

रंग भरें सुकल्पनाओं में, 

जीवन का पथ सुंदर होगा

नित्य नया निखार आयेगा, 

पहले से सुंदर कल होगा !

 

ऋतु आने पर बीज पनपते 

भीतर कोई चेता देता,

शुभ संकल्प बीज के सम ही 

सही समय पर ही फल देता!

 

नई मंजिलें राह देखतीं, 

रस्ते कुछ नव बुला रहे हैं

कर्म सदा हों सबके हित में, 

गीत यही तो सुना रहे हैं!


8 टिप्‍पणियां:

  1. ये कविता पढ़कर एक सुकून सा महसूस होता है। आपने मन के भटकाव से लेकर सही सोच और कर्म तक का सफर बहुत आसान भाषा में दिखाया। मुझे खास तौर पर ये बात अच्छी लगी कि आपने कर्म और संकल्प को सीधे जोड़ा, जैसे बीज और फल का रिश्ता होता है।

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  2.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 27 एप्रिल, 2026
    को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
      

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  3. ऋतु आने पर बीज पनपते
    भीतर कोई चेता देता,
    शुभ संकल्प बीज के सम ही
    सही समय पर ही फल देता!

    सुलझी हुई समझ की कसी बुनावट बात सादगी से कह गई । अभिनंदन।।

    जवाब देंहटाएं
  4. ऋतु आने पर बीज पनपते
    भीतर कोई चेता देता,
    शुभ संकल्प बीज के सम ही
    सही समय पर ही फल देता!

    सुलझी हुई समझ की कसी बुनावट बात सादगी से कह गई । अभिनंदन।।

    जवाब देंहटाएं
  5. ऋतु आने पर बीज पनपते
    काश अनुकूल हवा पानी मिले

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