नई मंजिलें राह देखतीं
जाने कहाँ-कहाँ से आते
मन दिन-रात गुना करता है,
कई विचारों के गालीचे
यह दिन-रात बुना करता है !
सोये-सोये जन्मों बीते ,
अब तो जगे भाग्य जो खोया,
वही मिलेगा इस जीवन में
जो कुछ कल हमने था बोया!
रंग भरें सुकल्पनाओं में,
जीवन का पथ सुंदर होगा
नित्य नया निखार आयेगा,
पहले से सुंदर कल होगा !
ऋतु आने पर बीज पनपते
भीतर कोई चेता देता,
शुभ संकल्प बीज के सम ही
सही समय पर ही फल देता!
नई मंजिलें राह देखतीं,
रस्ते कुछ नव बुला रहे हैं
कर्म सदा हों सबके हित में,
गीत यही तो सुना रहे हैं!

ये कविता पढ़कर एक सुकून सा महसूस होता है। आपने मन के भटकाव से लेकर सही सोच और कर्म तक का सफर बहुत आसान भाषा में दिखाया। मुझे खास तौर पर ये बात अच्छी लगी कि आपने कर्म और संकल्प को सीधे जोड़ा, जैसे बीज और फल का रिश्ता होता है।
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 27 एप्रिल, 2026
जवाब देंहटाएंको लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
बहुत बहुत आभार!
हटाएंबहुत प्रेरक रचना
जवाब देंहटाएंऋतु आने पर बीज पनपते
जवाब देंहटाएंभीतर कोई चेता देता,
शुभ संकल्प बीज के सम ही
सही समय पर ही फल देता!
सुलझी हुई समझ की कसी बुनावट बात सादगी से कह गई । अभिनंदन।।
ऋतु आने पर बीज पनपते
जवाब देंहटाएंभीतर कोई चेता देता,
शुभ संकल्प बीज के सम ही
सही समय पर ही फल देता!
सुलझी हुई समझ की कसी बुनावट बात सादगी से कह गई । अभिनंदन।।
ऋतु आने पर बीज पनपते
जवाब देंहटाएंकाश अनुकूल हवा पानी मिले