कोई दूसरा कब था
जिसकी खोज में दौड़ते हम फिरे
वह घर आने को बेताब जब था
राह जिसकी तकी बिछायीं थी पलकें
आने वाला आया ही हुआ जब था
हजारों खत न उसे भेजे होंगे
परदेश कभी गया ही नहीं जब था
याद कर करके जिसे थकते नहीं
दिल ने उसे भुलाया ही कब था
माँगी मनौतियां विनतियाँ भेजीं
हाले दिल उससे छिपा ही कब था
पुकारें किसे राह निहारें किसकी
वहाँ कभी कोई दूसरा कब था
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ब्रज की गोपियाँ और सारा का सारा ब्रज इसी भाव के साथ कृष्ण से सदैव जुड़ा रहा ।
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंWahhh 😃
जवाब देंहटाएंयाद कर करके जिसे थकते नहीं
दिल ने उसे भुलाया ही कब था
क्या बात ...
लाजवाब ।