शुक्रवार, जुलाई 3

कोई दूसरा कब था



कोई दूसरा कब था



जिसकी खोज में दौड़ते हम फिरे  

वह घर आने को बेताब जब था

 

राह  जिसकी तकी बिछायीं थी पलकें

आने वाला आया ही हुआ जब था

 

हजारों खत न उसे भेजे होंगे

परदेश कभी गया ही नहीं जब था 

 

याद कर करके जिसे थकते नहीं

दिल ने उसे भुलाया ही कब था

 

माँगी मनौतियां विनतियाँ भेजीं

हाले दिल उससे छिपा ही कब था

 

 पुकारें किसे राह निहारें किसकी

वहाँ कभी कोई दूसरा कब था


 

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