सोमवार, जुलाई 12

चंद ख़्याल


चंद ख़्याल 



पाया हुआ है सब जो खोजते हैं हम 
शब्दों में ज्ञान बसता दिल का था भरम 
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जाना हुआ सभी कहता है छोटा मन 
कोई कमी नहीं तो फिर क्यों करे जतन 
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छोड़ा यहाँ बाँधा वहाँ 
मुक्ति से डरता है जहां 
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मुश्किलों से डर जो ख़ुदा के द्वार आए 
पाए नहीं उसे बस पीड़ा को बढ़ाए 
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स्वप्नों में भयभीत हुआ मन 
सीमाओं में खुद को बाँधा 
  कहीं नहीं थी कोई सीमा
जब भी आँख खोल कर देखा 

30 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 13 जुलाई 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कलमंगलवार (13-7-21) को "प्रेम में डूबी स्त्री"(चर्चा अंक 4124) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  3. मुश्किलों से डर जो ख़ुदा के द्वार आए
    पाए नहीं उसे बस पीड़ा को बढ़ाए
    सच ! खुदा या ईश्वर को स्वार्थ के लिए ही याद करते हैं हम। उसे कभी बेवजह भी तो याद करें ।
    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

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    1. जब भगवान बेवजह याद आने लगेगा तब ही उससे मिलना होगा

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  4. आपने कविता के माध्यम से जो कहा अनीता जी, वह निश्चय ही चिन्तन-योग्य है।

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  5. यही तो होता है.इतनी आत्म-सीमित विचारणा ले कर परम तत्व को पाने की दुराशा पालना आदत में शुमार हो गया है.

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    1. परम तत्त्व को पाने की आशा मन में जग जाए इतना भी तो बहुत है, पा लिया है यह भ्रम न रहे तो बात एक न एक दिन बन जाएगी, ऐसा गुरुजन कहते हैं

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  6. परिधि में बंद परिदृश्यों सीमित दृष्टि प्रदान करते हैं।
    मन के पंख खोलकर विस्तृत सीमाहीन नभ की उड़ान संभव।
    सारगर्भित दार्शनिक अभिव्यक्ति आपकी रचनाओं की विशेषता है।
    प्रणाम
    सादर

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    1. स्वागत व आभार श्वेता जी, इस सुंदर प्रतिक्रिया हेतु

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  7. मन ही खींचे
    सीमा रेखा .
    मन को ही
    उन्मुक्त गगन में,
    पंख फैलाये
    उड़ते देखा.

    सुन्दर ! अनीता जी.

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    1. वाह! कितने सुंदर शब्दों में आपने मन की फ़ितरत बयान कर दी है

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  8. आदरणीया मैम , बहुत ही सुंदर रचना। सच है दुख में सुमिरन सब करें , सुख में करे न कोई , जो सुख में सुमिरन करे ,तो दुख काहे को होई । आपकी इस कविता ने श्रीमद्भगवद्गीता का वो प्रसंग याद दिला दिया जब भगवान कृष्ण अर्जुन को आत्मा और शरीर का अंतर बताते हैं । हृदय से आभार इस सुंदर रचना के लिए व आपको प्रणाम ।

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  9. न जाने क्यों मन कभी स्वच्छंद होना चाहता है तो कभी खुद को ही बंधनों में जकड़ लेता है । सोच रही हूं सीमाहीन विचार कैसे आएँ ? गहन दर्शन

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  10. भान होता है कि अब आँखें खुलना चाह रही है साथ ही यक्ष प्रश्न अब नहीं तो कब ? अति सुन्दर भाव ।

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  11. असीमित है ईश्वर का आशीर्वाद!!

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  12. बहुत सुंदर भावपूर्ण सृजन

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  13. हर ख़्याल उम्दा है।
    छोटा मन ही तो मेहनत से कतराता है... आत्मा व परमात्मा की क्या कोई सीमा हो सकती है? आदमी केवल असली भान न होने तक ही सीमा में बंधा रहता है।
    बहुत खूबसूरत।

    नया ब्लॉग, नई रचना पौधे लगायें धरा बचाएं

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  14. मुश्किलों से डर कर ख़ुदा के घर आना ...
    अच्छा तो होता है समय पूरा कर के आना पर दुःख सहने की क्षमता कहाँ होती है सब के अंसार ...

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