सोमवार, अक्टूबर 26

जहाँ पहुँच जाएँ मतवाली


हर सोसाइटी में महिलाओं का एक न एक ऐसा समूह होता है जो भजन, जाप आदि में रुचि लेता है और उत्सव के दिनों में अधिक सक्रिय हो जाता है। ऐसे ही एक समूह की दास्तान है यह रचना -

जहाँ पहुँच जाएँ मतवाली


 नवरात्रि का समय जब आता, हर इक मन में जोश समाता 

पुस्तक, मोबाइल झोले में, घर-घर में यह समूह पहुँचता 


उम्र भले ही साठ पार हो, मन में अब भी बचपन बसता 

करने आती हैं वे पूजा,  पहले महफ़िल का रंग जमता 


कोई कहे, “बहन, कैसी हो?” कोई कहती, “तुम ऐसी हो!” 

कोई कहे रात का किस्सा,  खोल दे बातों का पिटारा!


पाठ अभी तो शुरू न होता, शोर यहाँ पर जम के  होता। 

देवी शायद सोच में पड़ी, किसकी आवाज़ कहाँ से चढ़ी !


“अरी, ज़रा धीरे तो बोलो!” कहने वाली खुद ही बोले! 

एक सुनाए, चार सुनाएँ, सब अपनी ही धुन में गाएँ!


फिर जब गूँजें देवी के नाम, भक्ति से महके सारा धाम। 

ताली बजती, सुर लहराते, मन के सारे दुःख मिट जाते।


किंतु भजन समाप्त जो होता, असली उत्सव शुरू तब होता! 

रुको न! तस्वीर खिंचवाना, ग्रुप फ़ोटो के बिना न जाना ”


आगे, कोई पीछे जाए, कोई अपना पल्लू सँभाले। 

कोई कहती, “मुझे न छोड़ो, इसी तरफ़ से फोटो लेना!”


कोई मुख पर हाथ फिराए, कोई चश्मा ठीक कराए। 

कोई कहे, “ज़रा मुस्काओ, सुंदर मुखड़ा तो दिखलाओ!”


इक  फोटो से कहाँ गुज़ारा, “एक और, ये एंगल न्यारा!” 

गर किसी की आँखें बंद हुईं, फिर से सबकी टोली जुटी !


इनकी ऊर्जा का क्या कहना, मुश्किल इनके आगे रहना 

जहाँ पहुँच जाएँ मतवाली, खिल उठती है हर इक डाली !


इनके ठहाके, इनकी बातें, जैसे सावन की बरसातें।

 उम्र तन की भले बढ़ जाए, मन का बचपन कहाँ खो पाए !


 महिलाएँ नहीं, ये हैं बहार, हँसी-खुशी का खुला संसार ।

 जाप, भक्ति व मस्ती का मेल, इनके लिए जीवन है खेल !


रब करे सदा ये हँसती रहें, प्रेम धारा में बहती रहें। 

भजन भी हो, हँसी भी अपार, बना रहे अनोखा परिवार !



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