फार्म हाउस में एक दिन
भोर पूर्व आरंभ हुई थी, एक यात्रा सृष्टि फ़ार्म की
उडुपी ग्रैंड में किया नाश्ता, शिवगंगे की ओर दृष्टि थी
चट्टानों में गुँथी हुई थी, जहाँ पुरातन गाथा महान
चढ़ना कठिन, सहज उतरना, रह नहीं गया था समय का भान
गुफा में इक मंदिर प्राचीन, पुण्यवान जहाँ छूते जल
नंदी की विशाल मूरत थी, देखा वानरों को चंचल
अगली मंज़िल सृष्टि फ़ार्म, दोपहर होते-होते पहुँचे
श्वेत और भूरे कई श्वान, बिछड़े हुए, स्वागत में कूदे
खरगोश, कबूतर, टर्की का, ज्यों एक छोटा सा परिवार
रंगबिरंगे मुर्ग़े, बत्तख़ें, करते दिन भर वहाँ विहार
नीला घर था बाँह पसारे, बैठक खुली-खुली सी सुंदर
चारों ओर बने थे कमरे, भरा-पूरा था रसोईघर
ड्रैगन फ़्रूट, आम, चीकू थे, नींबू, सहजन और नारियल
कटहल और अमरूद के पेड़, दिये कुदरत ने ढेरों फल
बगिया में दोपहर बिता, संध्या घाटी सुब्रह्मण्यम में
नाग की स्वयंभू मूर्ति, नरसिंह भगवान की भी संग में
हो भक्तों को पावन दर्शन, है एक दर्पण गर्भगृह में
रात्रि भोजन भी विशेष था, मिलजुल कर बनाया था सबने
जल्दी उठकर सुबह, चले फिर, किया पड़ाव एमटीआर में
पुलकित ह्रदय लिए लौटे, मधुर यादों को दिल में समेटे !

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