भीतर जो भी भाव सृजन के
जलकर बाती तम हरती है
कवि ! तू अपनी ज्योति प्रखर कर,
अँधियारा घिर आया जग में
तज प्रमाद निज दृष्टि उधर कर !
श्रम से स्वेद बहे जो जग में
फूल खिलाता वही वनों में,
तिल-तिल कर जलता जब सूरज
उजियारा छाता इस जग में !
भीतर जो भी भाव सृजन के
अकुलाहट की आह जो जगी,
जीवन पथ निर्विघ्न बनाए
वही बनेगी क्षमता उर की !
