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शुक्रवार, जून 10

भीतर जो भी भाव सृजन के

भीतर जो भी भाव सृजन के 

जलकर बाती तम हरती है 

कवि ! तू अपनी ज्योति प्रखर कर, 

अँधियारा घिर आया जग में 

तज प्रमाद निज दृष्टि उधर कर !


श्रम से स्वेद बहे जो जग में 

 फूल खिलाता वही वनों में,

तिल-तिल कर जलता जब सूरज 

उजियारा छाता इस जग में !


भीतर जो भी भाव सृजन के 

अकुलाहट की आह जो जगी, 

जीवन पथ निर्विघ्न बनाए

वही बनेगी क्षमता उर की !