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गुरुवार, अक्टूबर 8

प्रार्थना

 प्रार्थना 

जो दिया है तूने हे प्रभु !

असीम है 

नहीं समाता इस झोली में 

तू दिए ही जाता है 

तेरी अनुकम्पा की क्या कोई सीमा है ?

उदार मालिक द्वारा दिए गए अतिरिक्त धन की तरह 

तू भरे जाता है संसार 

मेरा मन झुका है तेरे कदमों में 

बैठा नहीं जाता देर तक 

दुखती है बूढ़ी हड्डियाँ

करवटें बदलते बीतती है रात 

फिर भी जगाता है तू हर प्रभात 

रखता है सिर पर अपना हाथ 

मेरा मन डूब जाता है 

आकाश की तरह विस्तृत उस आनंद में 

जो तू बरसा ही रहा है  

अनवरत !