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गुरुवार, अक्टूबर 8

प्रार्थना

 प्रार्थना 

जो दिया है तूने हे प्रभु !

असीम है 

नहीं समाता इस झोली में 

तू दिए ही जाता है 

तेरी अनुकम्पा की क्या कोई सीमा है ?

उदार मालिक द्वारा दिए गए अतिरिक्त धन की तरह 

तू भरे जाता है संसार 

मेरा मन झुका है तेरे कदमों में 

बैठा नहीं जाता देर तक 

दुखती है बूढ़ी हड्डियाँ

करवटें बदलते बीतती है रात 

फिर भी जगाता है तू हर प्रभात 

रखता है सिर पर अपना हाथ 

मेरा मन डूब जाता है 

आकाश की तरह विस्तृत उस आनंद में 

जो तू बरसा ही रहा है  

अनवरत ! 


शुक्रवार, जून 24

प्रार्थना

प्रार्थना

पुहुप, पवन, पंछी व सितारे
जो भी साथी-संग हमारे,
सुख पायें, हो मंगल सबका
प्रमुदित हो पनपें वे सारे  !

जो भी सुंदर है, शुभकर है
आकर्षक, अति मनमोहक है,
केंद्र बने सबके जीवन का
जीवन का जो भी सम्बल है !

सहज, सरल हो जीवन राहें
हों पूर्ण सदा उनकी चाहें 
अंतर प्रकाश सदा प्रज्ज्वलित
रहें लक्ष्य की ओर निगाहें !

गुरुवार, जुलाई 30

कुछ पल


कुछ पल

ऐसे भी होते है कुछ पावन पल
जब खो जाती है प्रार्थना  
क्योंकि दो नहीं हैं वहाँ
नहीं घटती पूजा... उस निशब्द में  
रह जाता है एक सन्नाटा
और उसमें गूंजती कोई अनाम सी धुन..
निर्निमेष नयन.. और पिघलता हुआ सा अस्त्तित्व
काव्य नहीं झरता..
 कहने को कुछ शेष नहीं है
रह जाता है मौन और उसमें बजता कोई निनाद..
दिपदिप करता उजाला बंद नेत्रों के पीछे
दुनिया होकर भी नहीं है उन अर्थों में
शेष है एक पुलक, कौंध एक
एक अहसास से ज्यादा कुछ नहीं..
बस यही घड़ियाँ होती हैं जीने के लिए..


शुक्रवार, अगस्त 30

खो गया है आदमी

खो गया है आदमी

भीड़ ही आती नजर  
खो गया है आदमी,
इस जहाँ की इक फ़िकर
 हो गया है आदमी !

दूर जा बैठा है खुद
फ़ासलों की हद हुई,
हो नहीं अब लौटना
जो गया है आदमी !

बेखबर ही चल रहा
पास की पूंजी गंवा,
राह भी तो गुम हुई
धो गया है आदमी !

बांटने की कला भूल
संचय की सीख ली,  
बंद अपने ही कफन में
सो गया है आदमी !

श्रम बिना सब चाहता
नींद सोये चैन की,
मित्र बन शत्रु स्वयं का
हो गया है आदमी !

प्रार्थना भी कर रहा  
व्रत, नियम, उपवास भी,
वश में करने बस खुदा  
लो गया है आदमी !


गुरुवार, सितंबर 1

गणपति उत्सव पर हार्दिक बधाई !




हे गणपति ! हे विघ्न विनाशक !

हे गणपति हम तुझे चाहते
तुझसे बस हम प्रेम मांगते,
जग करता तेरी आराधना
पूर्ण करे तू सबकी साधना !

ज्ञान का सागर विघ्न विनाशक
रिद्धि सिद्धि का तू है दाता,
तू अचिन्त्य, अव्यक्त, अविनाशी
है हमारी आत्मा गणेषा !

तू विशाल, निर्भय, गर्वीला
दर्शन तेरा शक्ति जगाता,
तेरे गुण अनुपम अनंत हैं
चेतनता को जगाए गनेशा !

बड़ी शान है, बड़ा दबदबा
हर बाधा को तू रौंदता,
आगे बढने का बल देता
तू है दयालु, विघ्न को हरता !

कर्ण विशाल तू सबकी सुनता
नयनों में असीम गहराई,
जो भी झांके इन नयनों में
प्रज्ञा उसकी भी जग आई !

छोटे-बड़े सभी हैं तेरे
तू जागृत सजग प्रहरी सा,
कोई प्रेम से बंधता तुझसे
दुर्जन को तेरा पाश बंधता !

नन्हा सा मूषक भी तेरा
मोदक है आनंद का रसमय,
तुझे समर्पित है तन-मन-धन
हे अनंत जग तुझको ध्याता !