इंगित हर शै तुझको करती
कैसे हो अभिसार हमारा !
तुम वासी हो नीलगगन के
उस अपंक निरभ्र नीरव के,
माटी के तन में हम रहते
सने पंक में उड़ ना पाते !
कैसे उर स्वीकार हमारा !
अभिराम ! वैकुंठ निवासी
छलते अविरत निज माया से,
अर्घ्य चढ़ाता भक्त बना जो
डर जाता है निज छाया से !
हो कैसे उद्धार हमारा !
अर्थाकुल उर प्रश्न पूछता
उपालम्भ भी एक लिए है,
कृपा का बादल बरस रहा जब
अवलम्ब क्यों और दिए हैं !
किस पर है अधिकार हमारा !
इंगित हर शै तुझको करती
आर्त हुआ हर उर यह जाने,
किन्तु भुलावे में रख स्वयं को
उन्मन सा हर दुःख को माने !
जीवन है उपहार तुम्हारा !
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