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शनिवार, अगस्त 6

भारत


भारत 


ओ मेरे देश ! 

तेरे आँचल में जन्म लिया और 

तेरी हवाओं ने पाला हमको 

तेरी माटी में पले, खेले  

तेरी फ़िज़ाओं ने सम्भाला हमको !


तेरी हर बात पे रश्क होता  

दिल हमारा तेरे लिए ही रोता 

श्वेत हिम ढकी चोटियाँ हिमालय की 

या सर्द अमरनाथ की गुफाएं  

सुदूर समंदरों का किनारा हो 

किसी घनघोर जंगल की हवाएं  

तेरी ख़ुशबू हर तरफ़ इक सी फैली 

तेरी नेमत इक जैसी मिली !


अनेक ऋषियों की तप स्थली 

भोले बाबा का कैलाश बसता 

देवता भी तरसते हैं यहाँ आने को 

अन्नपूर्णा का जब भंडार खुलता !

कृष्ण की बाँसुरी दिन रात बजती  

प्रश्न गार्गी के गूंजते अब भी

बालिका देवी सी पूजी जाती 

दशानन  जलता है अब भी !


खेल का मैदान हो या प्रयोगशाला 

सभी में सफलता की ठानी 

हो कश्मीर या उत्तर पूरव  

दौड़ती फिरती ख़ुशी से ज़िंदगानी !

वक्त वह दूर नहीं जब नक्सली सारे  

बीती बात सी हो जाएँगे 

कालाधन ख़त्म, आत्म निर्भर बने 

अपने हक़ का ही सब कमाएँगे !


तू बनेगा सिरमौर दुनिया का 

योग आयुष का बोलबाला होगा 

समाधान मिलेगा हर समस्या का 

 अध्यात्म मज़हब की जगह लेगा !

वक्त तेरा चलो झूमें मिल के 

द्वेष बाक़ी न रहे किसी भी दिल में

तेरी दुआओं में  असर इतना 

मिलते दुश्मन भी यहाँ दोस्त बन के !


गुरुवार, अगस्त 4

आज़ादी का अमृत महोत्सव

आज़ादी का अमृत महोत्सव 


सप्त  दशकों व पाँच वर्ष का  

सफ़र तय किया है भारत ने ? 

आदि सनातन संस्कृति अनुपम 

राह दिखायी जग को जिसने !


जूझा कभी ग़ुलामी से जो  

बन सामर्थ्यवान बलशाली, 

राष्ट्र स्मरण करता, जिन्होंने 

आज़ादी मशाल थी बाली !


वेदों की ऋचाएँ  गूंजी 

श्रद्धा, ज्ञान, योग  का  बल है, 

भारत भाल गर्व से दमके 

आदि काल से एक राष्ट्र है !


कालजयी परंपराएँ हैं 

विविधताओं में है एकत्व, 

सर्व में छुपा  ब्रह्म  देखता 

धर्म उदार भारत का तत्व !


अति समृद्ध इतिहास मनोरम 

साहित्य बहे विमल धार सा, 

गंगा, यमुना कावेरी ने,  

 इस भू को माँ बन संवारा !


वनवासी, जनजाति संस्कृति 

भारत के हर प्रांत को जोड़े, 

अंतर्निहित एकता पोषक 

कैसे कोई इसको तोड़े !


वेदों से यह नाम मिला है 

अजर  शाश्वत शुभ ज्योति स्वरूप, 

सह अस्तित्त्व सिखाता भारत 

जाने भेद यह छिपा अरूप !