भारत
ओ मेरे देश !
तेरे आँचल में जन्म लिया और
तेरी हवाओं ने पाला हमको
तेरी माटी में पले, खेले
तेरी फ़िज़ाओं ने सम्भाला हमको !
तेरी हर बात पे रश्क होता
दिल हमारा तेरे लिए ही रोता
श्वेत हिम ढकी चोटियाँ हिमालय की
या सर्द अमरनाथ की गुफाएं
सुदूर समंदरों का किनारा हो
किसी घनघोर जंगल की हवाएं
तेरी ख़ुशबू हर तरफ़ इक सी फैली
तेरी नेमत इक जैसी मिली !
अनेक ऋषियों की तप स्थली
भोले बाबा का कैलाश बसता
देवता भी तरसते हैं यहाँ आने को
अन्नपूर्णा का जब भंडार खुलता !
कृष्ण की बाँसुरी दिन रात बजती
प्रश्न गार्गी के गूंजते अब भी
बालिका देवी सी पूजी जाती
दशानन जलता है अब भी !
खेल का मैदान हो या प्रयोगशाला
सभी में सफलता की ठानी
हो कश्मीर या उत्तर पूरव
दौड़ती फिरती ख़ुशी से ज़िंदगानी !
वक्त वह दूर नहीं जब नक्सली सारे
बीती बात सी हो जाएँगे
कालाधन ख़त्म, आत्म निर्भर बने
अपने हक़ का ही सब कमाएँगे !
तू बनेगा सिरमौर दुनिया का
योग आयुष का बोलबाला होगा
समाधान मिलेगा हर समस्या का
अध्यात्म मज़हब की जगह लेगा !
वक्त तेरा चलो झूमें मिल के
द्वेष बाक़ी न रहे किसी भी दिल में
तेरी दुआओं में असर इतना
मिलते दुश्मन भी यहाँ दोस्त बन के !
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