बुधवार, दिसंबर 2

पल-पल है चेतना नई सी

पल-पल है चेतना नई सी


ग्रह - नक्षत्र, धरा,रवि, चाँद 

पादप, पशु, नदिया, चट्टान,  

पवन डोलती तूफ़ां उठते 

सृष्टि पूर्ण मानव अनजान !


बंधी एक नियम, ऋत, क्रम में 

नित नूतन यह पुनर्नवा सी, 

अंतर घिरा अतीत धूम्र से 

पल-पल है चेतना नई सी !


सुख की चाह रहे भरमाती 

पीड़ा के वन में ले जाए, 

जितनी दौड़ लगे कम पड़ती 

भोला मन यह समझ न पाए !


जाने कब यह क्रम छूटेगा 

मन पर छाया भ्रम छूटेगा, 

ब्रह्मांड से एक हुआ फिर 

निज महिमा का बोध जगेगा !

 

20 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" गुरुवार 03 दिसम्बर 2020 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 3.12.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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  3. जाने कब यह क्रम छूटेगा
    मन पर छाया भ्रम छूटेगा,
    ब्रह्मांड से एक हुआ फिर
    निज महिमा का बोध जगेगा !
    ...सुबह-सुबह एक अच्छी रचना पढने को मिली। बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीया अनीता जी।

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  4. वाह!सुंदर अभिव्यक्ति ।

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  5. सुख की चाह रहे भरमाती

    पीड़ा के वन में ले जाए,

    जितनी दौड़ लगे कम पड़ती

    भोला मन यह समझ न पाए
    कटु सत्य !

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  6. बंधी एक नियम, ऋत, क्रम में

    नित नूतन यह पुनर्नवा सी,

    अंतर घिरा अतीत धूम्र से

    पल-पल है चेतना नई सी !बहुत सुन्दर रचना।

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  7. यही आस तो जीवन की आकांक्षा है जिसमें बोध फलित हो ।

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