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शुक्रवार, अगस्त 5

डूबे हैं आकंठ

डूबे हैं आकंठ

धूसर काले मेघों से आवृत आकाश
निरंतर बरस रहा
जल की हजार धाराओं से
नहा रही हरी-भरी वसुंधरा
वृक्ष, घास, लतर, पादप
तृप्त हुए सभी डूबे हैं आकंठ
नीर के इस आवरण में ढका है दृष्टिपथ
गूँज रही है निरंतर गिरती बौछार की प्रतिध्वनि
निज नीड़ों में सिमटे चुप हैं पंछी
फिर भी बोल उठती है कभी कोकिल
अथवा कोई अन्य पांखी परों को झाड़ता हुआ
ले चुके हैं न जाने कितने कीट जल समाधि
अथवा तो धरा की गोद में उन्हें पनाह हो मिली
घास कुछ और हरी हो गयी है
नभ कुछ और काला
सावन के पहले से ही मौसम
 हुआ है सावन सा मतवाला
असम की हरियाली का यही तो राज है
ऋतुओं की रानी यहाँ वर्षा बेताज है



मंगलवार, अगस्त 26

ये नन्ही नन्ही चिड़ियाएँ


ये नन्ही नन्ही चिड़ियाएँ


श्वेत और श्याम पर हैं जिनके
चुन-चुन कर लाती है घास की लतरें
छोड़ आती हैं एक घन वृक्ष की
शाखाओं और पत्तियों में
एक नीड़ का फिर निर्माण हो रहा है
सृष्टि चक्र यूँ ही बहा जा रहा है
तांक-झांक करता है काग एक वहाँ आकर
जाने क्यों चिड़ियाएँ अगले ही पल नजर नहीं आतीं
शायद गयी हैं दूर लम्बी उड़ान पर
अथवा तो खोज में किसी कीट या पदार्थ के ! 

मंगलवार, अगस्त 5

उर उसी पी को पुकारे

उर उसी पी को पुकारे


झिलमिलाते से सितारे
झील के जल में निहारें,
रात की निस्तब्धता में
उर उसी पी को पुकारे !

थिर जल में कीट कोई
खलबली मचा गया है,
झूमती सी डाल ऊपर
कोई खग हिला गया है !

दूर कोई दीप जलता
राह देखे जो पथिक की,
कूक जाती पक्षिणी फिर
नींद खुलती बस क्षणिक सी !

स्वप्न ले जगत सारा
रात्रि भ्रम जाल डाले,
कालिमा के आवरण में
कृत्य कितने ही निभा ले !