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शनिवार, अक्टूबर 7

हल्का हो मन उड़े

हल्का हो मन उड़े


यादों की गठरी ले 

तन-मन ये चलते हैं, 

कल का ही जोड़ आज 

 संग लिए फिरते हैं !


कोई तो उतारे बोझ

हल्का हो मन उड़े, 

एक बार बिना भार 

ख़ुद से फिर आ जुड़े !


असलियत जान वह 

राज यही खोलेगा, 

प्रियतम है साथ सदा 

बात हर तोलेगा !


बुधवार, जून 17

मंजिल और रस्ता


मंजिल और रस्ता 

लगता है यूँ सफर की.. आ गयी हो मंजिल
या यह भी इक ख्याल ही निकलेगा दिलों का

यूँ ही चले थे उम्र भर मंजिल पे खड़े थे
अब लौट के पहुंचे जहाँ वह अपना ही घर था

रस्ते में खो गयी गठरी जो ले चले
राही भी न बचा रस्ता भी खो गया सा 

अब एक ही रहा है चुप सी ही इक लगाये
कहने को कुछ नहीं है यूँ मौन बह गया