ये नन्हे श्रमिक
एक
आवाज पर मालिक की दौड़े आते
पुरानी
मटमैली जैकेट में तन को ढांपते
मुंह
में जाने क्या चबाते
ये बच्चे
अभी
से बड़े हो गये हैं
साहब
का थैला गाड़ी तक पहुंचाते
फिर
से दुकान पर आकर खड़े हो गये हैं
आँखों
में चमक अभी शेष है
फुर्सत के क्षणों में हंसते और खेलते भी होंगे
पर
जाने कब वे पल आते हैं
अभी
तो ढोते रहना है बोझा
और
ढाबे पर जाकर बुझानी है क्षुधा
चाय
और टोस्ट से अपने आप ही
माँ
के हाथों से खाना.. इनके नसीब में नहीं

