खुले आकाश सा
सवाल बन के जगाये कई रातों को
जवाब बनकर एक दिन वही सुलाता है
ढूँढने में जिसे बरसों गुजारे
वही हर रोज तब आकर जगाता है
जिसकी चाहत में भुला दिया जग को
जग की हर बात में नजर आता है
छुपा हुआ है जो हजार पर्दों में
खुले आकाश सा दिपदिपाता है
मांगते फिरते हैं जिससे सुखों की दौलत
बेहिसाब वह रहमतें बरसाता है !
