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सोमवार, जनवरी 18

कोई जानता है

 कोई जानता है
मन के ‘परदे’ पर 
यादों की फिल्म चलती है 
‘वह’ उसी तरह रहता है अलिप्त 
जैसे आँख के पर्दे पर 
चित्र बने अग्नि का तो जलती नहीं 
न ही भीगती समुन्दर की लहरों को घंटों देखते हुए 
स्मृतियों के बीज हमने संभाल कर रखे हैं 
वर्तमान और अनेक जन्मों के 
उन्हें स्वयं ही बोते हैं मन की धरा पर 
फिर यदि बीज हुआ दुख की याद का तो 
काँटों के वृक्ष उगाते हैं 
और देखते हैं जंगल उठते-बढ़ते 
जो हमारी ही संतति है 
उन्हीं से सुखी-दुखी होते हैं 
जब सृष्टि का पालन किया तो संहार से क्यों डरते हैं 
उखाड़ फेंकें यदि उन स्मृतियों के वनों को 
या देखते रहें उस परदे की तरफ 
जो सदा बना रहता है अलिप्त 
 पूर्व फिल्म के, दौरान या बाद में भी ! 

बुधवार, अगस्त 8

खुले आकाश सा




खुले आकाश सा



सवाल बन के जगाये कई रातों को
 जवाब बनकर एक दिन वही सुलाता है
 ढूँढने में जिसे बरसों गुजारे
वही हर रोज तब आकर जगाता है
जिसकी चाहत में भुला दिया जग को
 जग की हर बात में नजर आता है
छुपा हुआ है जो हजार पर्दों में
खुले आकाश सा दिपदिपाता है
मांगते फिरते हैं जिससे सुखों की दौलत
बेहिसाब वह रहमतें बरसाता है !  



शनिवार, जनवरी 31

एक इल्तजा


एक इल्तजा


दबा न रहे राख में दहकने दो अंगारा
मखमली सुर्ख चमकने दो अंगारा,
जल जाने दो हर सूं... कि निखर आएगा रूप
बरस जाने के बाद ज्यों खिल के निकले है धूप !

रहे न कोई पर्दा आज गिर जाने दो हर दीवार
कभी तो हो वह सामने... कभी तो हो दीदार
हट जाने दो हर शर्मोहया आज सामने आओ
फिर न मिलेगी यह रात अब न शरमाओ !

ओ खुदा ! अब न तुझे दूर से पुकारेंगे
तेरे हैं हम हक से तुझे निहारेंगे
अब निभाने होंगे वे सारे वादे तुझे
नहीं बहला सकेगा अब दूर से मुझे !

अजीब बात है यह वह ही लिखवाता है
खुद से मिलने के सिले किये जाता है,
‘मैं’ तो हूँ ही नहीं इस कहानी में
 बस थामी है कलम हाथ में, नादानी में !