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शनिवार, अक्टूबर 1

आतुर है सूरज उगने को





आतुर है सूरज उगने को

श्वासें महकें  अंतर चहके 
पल पल नव गीत बजें भीतर,
जीवन जो भी भेंट दे रहा
स्वीकारें उत्साहित  होकर !

कभी-कभी ढक गया उजाला
कुछ भी नजर नहीं आता है, 
खुशियों के पीछे-पीछे ही
गम का दूत चला आता है !

लेकिन बादल कब तक आखिर
अंशुमान को ढक पाए हैं,
कब तक पर्वत रोक सकेंगे 
तूफान से टकराए हैं !

चलते जाना है रस्ते पर, 
कंटकमय या पथरीला है,
मंजिल दूर नहीं है साथी
अनथक थोड़ा सा चलना है !

खाली करके मन में भर लें, 
नए जोश औ' नए होश को,
उपवन बन जाये मन आंगन,
आतुर है सूरज उगने को !

हर उत्सव संदेशा लाया, 
थम कर थोड़ा भीतर झाँकें 
दुःख के पीछे छिपा हुआ जो, 
सुख के उस दरिया को पाके  I



सोमवार, मार्च 23

महामारी

महामारी 


कितना अलग मिजाज है आजकल दुनिया का 
न कोई किसी से मिलता है 
न कहीं आता जाता है 
झूठ-मूठ लड़ाई का बहाना बनाकर 
बैठे हैं अलग-अलग कमरों में 
नजरबंद हैं विदेश से आये लोग 
कोई नहीं पूछता, मेरे लिए क्या लाये 
बल्कि मौन रहकर ही सवाल उछालता है
इटली क्यों गए थे, भला यह भी कोई समय है 
स्पेन घूमने जाने का 
सोसाइटी में होने लगी है खुसर-पुसर 
फलां नम्बर में रात कोई आया है 
जाने कोरोना अपने साथ लाया हो ! 
सड़कें सूनी हैं, बच्चे हैरान हैं 
घर में बैठे रहने का मिला फरमान है 
जितना चाहे खेलो पर घर पर ही 
लेकिन आँख बचाकर वे निकल जाते हैं 
वीरान गलियों में साइकिल चलाते हैं 
कोरोना के भय से नींदें उड़ गयी हैं 
प्रधानमंत्री के शब्द जैसे मरहम लगाते हैं 
भीतर सोया जोश जगाते हैं 
हाँ,  लगेगा जनता कर्फ्यू 
और बजेंगी थालियाँ भी 
उन जांबाजों के लिए जो बने हैं रक्षक 
समाज और राष्ट्र के प्रहरी 
कुछ न बिगाड़ पाएगी भारत का
निगोड़ी  यह महामारी !  

सोमवार, फ़रवरी 18

विदाई समारोह


यह कविता मैंने इवा जी के लिए लिखी है, जिनका विदाई समारोह इसी हफ्ते हमारे क्लब में होने जा रहा है, वह एक शिक्षिका हैं और मेरा पुत्र  भी उन्हीं के स्कूल से नर्सरी में पढ़ा था. इस कविता के माध्यम से मैं उन सभी शिक्षिकाओं का भी आभार व्यक्त करती हूँ जो अपने स्नेह और श्रम से नन्हें-मुन्नों के जीवन में आगे बढने की प्रेरणा बनती हैं.


आदरणीय व प्रिय श्रीमती इवा हजारिका के लिए शुभकामनाओं सहित


लघु केश, गर्वीला मुखड़ा, जोश हृदय में, रंग गेहुआँ
बच्चों की दुलारी टीचर, बायदो मिलें सदा मुस्काकर

जोरहाट में बीता बचपन, दो भाई व एक बहन थे
अर्थशास्त्र में ली थी डिग्री, किया काम आर.आर.एल में

सन बयासी में बनीं वह दुल्हन, दुलियाजान आयीं संग दादा
अगले बरस ही पांखी आयी, पाही का अभी दूर था आना

गयी स्कूल जिस वर्ष रितिषा, पीछे-पीछे माँ भी आयी
तब से ले आज तक दिल से, वर्ष सत्ताईस ड्यूटी निभाई

जोश भरा त्वरित कदमों में, खिला-खिला सा अंतर उनका
पहली प्राथमिकता स्कूल थी, जैसे दूजा घर था उनका

असम साहित्य सभा दुलियाजान ने, हाल ही में किया सम्मानित
स्वर्ण जयंती समारोह में, बच्चों को किया सम्बोधित

अभिनय का है शौक बहुत, पहले ट्रूप संग थीं जाती  
कलाकार का दिल पाया है, लघु कहानी भी लिखतीं

अश्रु झलक आते पलकों में, बात बिछड़ने की जब आए
लगभग तीन दशक का साथ, कैसे लेडीज क्लब भुलाए

मन में यादों का हुजूम ले, तीन वर्ष दिल्ली में रहेंगी
टाईनी टॉट्स की प्रिंसिपल बायदो, गौहाटी में फिर बसेंगी

बिटिया बड़ी यूएस में रहती, गुजराती दामाद है सुंदर
मास्टर्स की डिग्री ली हैं, पेशे से दोनों इंजीनियर

पाही नोएडा में पढ़ती है, कानून की करे पढ़ाई
उसकी रूचि अदालत में है, सिम्बियोसिस में सीट है पाई

 सदा रहें स्वस्थ व हर्षित, यही दुआ दिल से देते
हो जीवन सुखद, मुदित सबका, यही कामना हम करते