नदियां लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नदियां लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, अप्रैल 4

सदियों से हम वहीं खड़े थे

सदियों से हम वहीं खड़े थे 

सदा मानव ने स्वयं को श्रेष्ठ माना
अपने अस्तित्त्व को बनाये रखने 
और फलने-फ़ूलने के लिए 
प्रकृति की अन्य सन्तानों को दांव पर लगाया 
पंछियों से उनका आश्रय छीना
पशुओं को बेघर किया 
कीट नाशकों का कर निर्माण 
अनेकों प्रजातियों को विलुप्त ही कर दिया !

नदियों को नालों में बदल दिया 
समन्दरों को कचराघरों में 
भर दिया, आकाश को अंतहीन ध्वनियों से 
 मिटा दिया, आवश्यकता और विलासिता के मध्य की रेखा को ही 
देव संस्कृति और असुर संस्कृति का 
ऐसा घेलमाल किया 
कि सर्वे भवन्तु सुखिनः के स्थान पर 
‘मैं सुखी होऊं’ का मन्त्र गूँजने लगा !

मानव की भोगलिप्सा का मुख
 सुरसा की तरह बढ़ता ही गया 
जिसमें वह लील गया 
लाखों निरीह प्राणियों को जिंदा ही 
एक दिन तो चक्र घूमना ही था 
अब नारायण का चक्र उल्टा चल रहा है 
मानव सिमट रहे हैं 
जीव-जगत प्रसारित हो रहा है 
नदियां श्वास ले रही हैं 
सागर उत्तंग लहरें उठा रहे हैं !

प्रकृति स्वयं को संवार रही है स्वयं ही 
मानव देवी की मूर्तियों को सजाता है 
फिर उससे भी जल को दूषित करता है 
जीती-जागती माँ  है यह प्रकृति 
उसका श्रृंगार करने की न मानव में सामर्थ्य है न इच्छा ही
जहाँ ज्ञान हो शुभ, वहाँ शुभेच्छा जगेगी 
मानव को ज्ञान का अमृत पीना होगा 
 इस दुनिया में धरती पुत्र बनकर जीना होगा 

यह विषाणु का बीज मानव ने ही बोया है 
अब भी यदि वह सोया है तो रोना ही पड़ेगा 
क्योंकि कोरोना में ही छुपा है रोना !  

 मानव श्रेष्ठ है... इसलिए 
कि वह सभी को साथ लेकर चले 
देखे, कि हर प्राणी, हर फूल-पौधा भी खिले !