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गुरुवार, अप्रैल 16

आँगन में उतरा हो जैसे

आँगन में उतरा हो जैसे



साँझ-सवेरे जब उपवन में, पंछी गाये पीहू-पीहू  

आँगन में उतरा हो जैसे, फूला, खिला बोहाग बीहू !


आया बसंत, हर मन उत्सुक, स्पंदित होकर जागी धरती 

भोर कभी या संध्या बेला, सुनी दूर से थाप ढोल की !


मन आतुर हो उठे हैं सारे, कदम थिरकने को तैयार 

पंछी, पशु सभी हुए शामिल, कपो फूल की छायी बहार  !


नदियों, पोखर में गायों को, लेप लगाकर स्नान कराते 

सब्ज़ी, फल, हरी घास दे, नयी रस्सी, नव घंटी दिलाते !


तिल, गुड़, चावल के पकवान, स्वादु अतीव घर-घर में बनते 

नये साल का स्वागत करने, आशीर्वाद बड़ों के लेते 


 गमसा बाँधे, बीहु नाचते, बालक, युवा सभी गलियों में 

नयी पोशाक पहन निकलते,  स्वागत हुआ ताम्बुल,पान से


हरे साग-सब्जियाँ पकाती, माँ का काम बहुत बढ़ जाता 

दुनिया भर में इस उत्सव का, अब हर कोई नाम जानता 


कुदरत के इस मधु उत्सव में, रंगाली बीहू के किस्से 

 तय हो जाते जीवन भर के, आँखों ही आँखों में रिश्ते 



 

मंगलवार, फ़रवरी 10

चक्र सृष्टि का

चक्र सृष्टि का 


पाँच बज गये 

भोर हो गई 

धरा के इस भाग ने मुख मोड़ लिया हैं

सूरज की ओर

धीरे-धीरे उजाला होगा 

अलसाये, उनींदे बच्चे जागेंगे 

मंदिरों में शंख व घंट नाद होंगे 

भोर में करेंगे किसान रूख खेतों का 

महिलाएँ चौके का 

और बच्चे स्कूलों का 

धरा और सूरज जब आमने-सामने होंगे 

प्रखर प्रकाश ज़ाहिर कर देगा 

हर कतरा कोना

सब कुछ स्पष्ट नज़र आएगा 

लोग घरों में छुप जाएँगे 

ताप का सामना कौन करे 

सत्य का प्रकाश ऐसा ही होता है 

चमकदार प्रखर तेज 

खिड़कियों पर पर्दे लग जाएँगे 

कड़कती धूप में ख़ाली हो जाएँगीं सड़कें 

धरा फिर घूम  जाएगी जरा

गोधूलि की बेला में 

बगीचे किलकारियों से भर जाएँगे 

जब घूमते-घूमते सूरज से दूर जाएगी 

धुँधलका छायेगा संध्या का 

फिर अंधकार का साम्राज्य और लोग 

घरों में बंद हो नींद के आग़ोश में खो जाएँगे 

यह एक चक्र प्रकृति का 

न जाने कब से चल रहा है 

सूरज और धरती के इस प्रेम में 

हर प्राणी पल रहा है !


शनिवार, फ़रवरी 7

समुद्री यात्रा


प्रिय ब्लॉगर मित्रों, कुछ दिनों पहले हमने पहली एक लंबी समुद्री यात्रा की, उसी के दौरान ये कविताएँ लिखीं थीं, इन्हें एक साथ पढ़ने पर ही आप उस यात्रा की कुछ झलक पा सकते हैं, ऐसा मुझे लग रहा है, पढ़कर अपनी राय से अवश्य अवगत करायें।

परिवार 


लंबी समुद्री यात्रा में 

कही एक कहानी किसी ने

सौर मण्डल में रहती है पृथ्वी 

और पृथ्वी पर सागर 

रुकिए !  पूछा बालक ने

 सौर मण्डल कहाँ रहता है ? 

आकाश गंगा में ! 

और आकाश गंगा ? 

इस अनंत ब्रह्मांड में !

अब सुनो, 

हम सागर की बात कर रहे थे 

सागर में तैर रहा है एक जहाज़ 

जहाज़ पर हज़ारों लोग 

लोगों में एक परिवार 

 जिनके मध्य बहता है प्यार 

क्योंकि करते हैं सभी 

सबको 

सहज स्वीकार ! 


कबूतर 


जहाज़ पर जाने कहाँ से 

उड़ता हुआ 

आया एक कबूतर 

पल भर बैठ बालकनी में 

चला गया 

चारों ओर है जल ही जल 

लौटकर आएगा 

किसी मस्तूल पर जहाज़ की 

चुपचाप बैठ जाएगा 

उसे नहीं मालूम 

डेक पर फ़ूड कोर्ट है 

जहाँ पानी है 

और दाना भी 

शायद कुछ और प्राणी भी 

बसते हों जहाज़ पर 

चूहे या तिलचट्टे 

पर कबूतर तो दो दिन का मेहमान है 

भूमि दिखते ही उड़ जाएगा 

फिर किसी नयी दिशा में मुड़ जाएगा !



पापाजी 


आज आपकी याद आ रही है 

हम धरती से बहुत दूर पानी में हैं 

आपको बताते

तो कितने हैरां न होते आप 

ख़ुशी से भरकर पूछते 

ढेर सारे प्रश्न ! 

पानी का रंग कैसा है ?

इंजन कितना बड़ा है ?

कितने लोग हैं ?

हम मज़े ले लेकर आपको सब बताते 

कितनी ही बातें मन में ही रह जाती हैं

जो केवल आप से कह सकते थे 

कुछ फूल हर जगह नहीं पनपते 

कुछ बातें भी ऐसी होती हैं ! 



जल जगत 


गगन में सूर्य 

धरा पर सिंधु 

सिंधु पर फैला है आलोक 

मीलों तक चाँदी सी 

चमक रही हैं लहरें 

गूंज रहा है उनका निनाद 

इस सूने विशाल प्रांगण में 

कल-कल, कल-कल 

जहाज़ के वेग से बनती हैं लहरें 

और बिखर जाता है ढेर सारा श्वेत फेन 

नीले पानी में पल भर के लिए 

ऐसा घट रहा है बार-बार 

पर अच्छा लगता है उतना ही 

हर बार 

दूर तक पानी ही पानी है 

जिसकी गहराई में एक नहीं 

कई संसार बसते हैं 

जहाँ शंख, सीपियाँ व कछुए रहते हैं 

कोरल के गाँव हैं और मछलियों के स्कूल हैं 

थोड़ा सा नीचे झाँकों तो 

जल में जीवन पनप रहा है 

धरती से अनभिज्ञ एक और जगत 

अपना भाग्य रच रहा है !



शुक्रवार, दिसंबर 27

नया वर्ष

नया वर्ष 


चार दिन है शेष हैं 

फिर वर्ष यह खो जाएगा 

स्मृति बनाकर इतिहास के पन्नों में 

सहेज लिया जाएगा 

कितने सुख-दुख 

अपने दामन में छिपाये 

कितनी बार रोये मन 

कितना मुस्कुराए 

धरती ने सही कितने ही दंश 

गगन पर घन कितने छाये 

देशों के भाग्य बने, टूटे 

 मौसम ने कितने

ख़ुद में बदलाव लाए 

जीवन यूँही चलता जाए 

हर नया वर्ष कुछ पल थम 

ख़ुद को देखने का

 अवसर दे जाये 

व्यक्ति, समाज और राष्ट्र 

सभी को अवलोकन कराए  

जो बीत गया उससे देकर सीख 

नया वर्ष आगे ले जाये ! 


गुरुवार, अक्टूबर 24

जीवन यही तो माँगता

जीवन यही तो माँगता


हम कौन हैं ? यह याद है ?

गर याद,  दिल आबाद है 

आबाद है इक ख़्वाब से 

मंज़िल यहीं, इस बात से  !

 

 है याद? हमको क्या मिला?

गर याद है तो क्या गिला !

पग धरने को धरती मिली 

उड़ने को आसमां मिला !


साँसे मिलीं, इक मन मिला 

 मन में बसा प्रियतम मिला, 

 यह याद है ? क्या भेंट दी 

गर याद है तो क्या किया ? 


माँगा सदा चाहा सदा 

सिमटा ह्रदय बाँटा कहाँ,

जो पास अपने गर लुटा 

रोशन रहे दिल का जहाँ  !


सुख-चैन बरसेगा अगर 

चलता रहे दिन-रात बस 

हम कौन?हमको क्या मिला? 

से क्या दिया? का सिलसिला !


गुरुवार, सितंबर 12

सच से नाता तोड़ लिया जब

सच से नाता तोड़ लिया जब

शब्दों में ताक़त होती है 

शब्द अगर सच कहना जानें,

धरती ज्यों सहती आयी है 

संतानें भी सहना जानें !


माटी, जल में विष घोला है 

पनप रही यहाँ  लोभ संस्कृति, 

खनन किया, वन जंगल काटे 

 आयी बुद्धि में भीषण विकृति !


युद्धों के पीछे पागल है 

दीवाना मानव क्या चाहे, 

शिशुओं की मुस्कानें छीनीं 

 रहीं अनसुनी माँ की आहें !


कहीं सुरक्षित नहीं नारियाँ 

वहशी हुआ समाज आज है, 

अनसूया-गार्गी  की धरती 

भयावहता  का क्यों राज है !


कहाँ ग़लत हो गयी नीतियाँ 

भुला दिये सब सबक़ प्रेम के, 

अपना स्वार्थ सधे कैसे भी 

शेष रहें हैं मार्ग नर्क के !


टूट रहे परिवार, किंतु है 

सीमाओं में जकड़ा मानव !

सच से नाता तोड़ लिया जब  

जागा भीतर सोया दानव !


बुधवार, जून 5

अब चलो, पर्यावरण की बात सुनें

अब चलो, पर्यावरण  की बात सुनें 


ख़त्म हुई चुनाव की गहमा गहमी 

अब चलो, पर्यावरण  की बात सुनें 


सूखते जलाशयों पर नज़र डालें 

कहीं झुलसती धरती की बात सुनें 


कहीं घने बादलों का करें स्वागत

उफनती नदियों का दर्द भी जानें  


पेड़ लगायें, जितने गिरे या कटे   

जल बचायें, भू में जज्ब होने दें  


गर्म हवाओं में इजाफ़ा मत करें  

ग्रीनहाउस गैसों को ना बढ़ायें 


बरगद लगायें बंजर ज़मीनों पर 

न हो, गमलों में चंद फूल खिलायें 


पिघल रहे ग्लेशियर बड़ी तेज़ी से 

पर्वतों पर न अधिक  वाहन चलायें 


सँवारे कुदरत को, न कि दोहन करें 

मानुष   होने का कर्त्तव्य निभायें 


पेड़-पौधों से ही जी रहे प्राणी 

है यह धरा  जीवित, उसे बसने दें 


जियें स्वयं भी जीने दें औरों को

नहीं कभी कुदरती आश्रय ढहायें 


साथ रहना है हर हाल में सबको 

बात समझें, यह  औरों को बतायें ! 


सोमवार, मार्च 18

गहराई में जा सागर के

गहराई में जा सागर के 


हँसना व हँसाना यारों 

 अपना शौक पुराना है,

आज जिसे देखा खिलते 

कल उसको मुरझाना है !

 

जाने कब से दिल-दुनिया 

ख़ुद के दुश्मन बने हुए, 

बड़े जतन कर के इनको 

तम से हमें जगाना है !

 

बादल नहीं थके अब भी  

कब से पानी टपक रहा ,

आसमान की चादर में 

 हर सुराख़ भरवाना है !


सूख गये पोखर-सरवर  

 दिल धरती का अब भी नम, 

उसके आँचल से लग फिर 

जग की प्यास बुझाना है !


दर्द छुपा सुख  के पीछे  

 संग फूल के ज्यों कंटक, 

किसी तरह  हर बंदे को 

 माया से भरमाना है !


ऊपर ही सोना भीतर 

पीतल, पर उलटा भी है 

गहराई में  सागर के  

सच्चा मोती पाना है !