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रविवार, जुलाई 2

पा परस उसका सुकोमल



पा परस उसका सुकोमल

बह रहा है अनवरत जो
एक निर्झर गुनगुनाता,
क्यों नहीं उसके निकट जा
दिल हमारा चैन पाता !

झूमती सी गा रही जो
हर कहीं सोंधी बयार,
पा परस उसका सुकोमल
क्यों न समझे झरता प्यार !

निकट ही जो शून्य बनकर
बन अगोचर थाम रखता,
भूल जाता बेखुदी में
क्यों न उसका मान रखता !

जो बरसता प्रीत बनकर
संग है आशीष बनकर,
क्यों नहीं नजरें हमारी
चातकी सी टिकी उसपर ! 

गुरुवार, जनवरी 23

जाग कर देखें तो सही

जाग कर देखें तो सही

क्या क्या चूकते जा रहे हैं
इस नींद के आकर्षण में...
नींद जो केवल रात्रि को ही नहीं दिन में भी
स्वप्न दिखाती है
झूठ-मूठ ही सुख का भ्रम देती
वास्तव में बहकाती है
जाग कर देखें तो सही
भोर हुई है अनोखी
पंछियों का कलरव नहीं सुना ?
आई फूलों की सुगंध लिए बयार
बनाएं उसे गले का हार
न कि बदलते रहें करवटें यूँ ही पड़े-पड़े
पुनः पुनः दोहराते रहें
बार-बार देखे स्वप्नों को
वही पुराने राग रोज गाते रहें
सांता आता है वर्ष में एक दिन
जीवन उपहार लिए चला आता है हर रोज
हर घड़ी, हर दिन को उत्सव बना लें
अपनी पुलक से, छुवन से प्रीत की
इर्द-गिर्द एक जन्नत बना लें
छोटी सी अपनी झोली में
भर सकते हैं जितना समेट लें
बरस रहा है विराट रात-दिन
जीवन का गीत गा लें समय रहते
कब होगी विदाई...कौन जाने ?