पा परस उसका सुकोमल
बह रहा है अनवरत
जो
एक निर्झर
गुनगुनाता,
क्यों नहीं उसके
निकट जा
दिल हमारा चैन
पाता !
झूमती सी गा रही
जो
हर कहीं सोंधी
बयार,
पा परस उसका
सुकोमल
क्यों न समझे
झरता प्यार !
निकट ही जो शून्य
बनकर
बन अगोचर थाम
रखता,
भूल जाता बेखुदी
में
क्यों न उसका मान
रखता !
जो बरसता प्रीत
बनकर
संग है आशीष बनकर,
क्यों नहीं नजरें
हमारी
चातकी सी टिकी
उसपर !

