बुधवार, मार्च 25

प्रेम रहेगा कैसे मन में

प्रेम रहेगा कैसे मन में


जब ना कोई घर में रहता 

 तब चुपके से कान्हा आता, 

नवनीत चुरा मटका तोड़े 

गोपी का हर दुख मिट जाता !


द्वार खुला ही छोड़ गई थी 

निशदिन उसकी राह देखती, 

उसका होना ही बाधा था 

कैसे वह यह बात बूझती !


वह रहती या रहता कान्हा 

दोनों नहीं समाते घर में, 

नील गगन सा जो विशाल है 

प्रेम रहेगा कैसे मन में !


अलग कहाँ थी वह कान्हा से 

जैसे दिल के भीतर झाँका, 

वही प्रीत-संगीत, नृत्य था 

ग्वाल-बाल बना वही बाँका !




 

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