प्रेम रहेगा कैसे मन में
जब ना कोई घर में रहता
तब चुपके से कान्हा आता,
नवनीत चुरा मटका तोड़े
गोपी का हर दुख मिट जाता !
द्वार खुला ही छोड़ गई थी
निशदिन उसकी राह देखती,
उसका होना ही बाधा था
कैसे वह यह बात बूझती !
वह रहती या रहता कान्हा
दोनों नहीं समाते घर में,
नील गगन सा जो विशाल है
प्रेम रहेगा कैसे मन में !
अलग कहाँ थी वह कान्हा से
जैसे दिल के भीतर झाँका,
वही प्रीत-संगीत, नृत्य था
ग्वाल-बाल बना वही बाँका !

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