दूजा निज आनंद में डूबा
पंछी दो हैं एक बसेरा
एक उड़े दूसरा चितेरा,
निज प्रतिबिम्ब से चोंच लड़ाता
कभी जाल में भी फंस जाता !
कड़वे मीठे फल भी खाये
बार-बार खाकर पछताए,
इस डाली से उस शाखा पर
व्यर्थ ही खुद को रहा थकाए !
कुछ पाने की होड़ में रहता
क्षण-क्षण जोड़-तोड़ में रहता,
कभी तके दूजे साथी को
जो बस देखे कुछ न कहता !
पलकों में जब नींद भरी हो
फिर भी करता व्यर्थ जागरण,
दूजा निज आनंद में डूबा
देख रहा है उसका वर्तन !
