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सोमवार, सितंबर 23

शृंगार

शृंगार 


सज गया स्मित हास अधरों पर 

नयनों में स्वप्नों का काजल, 

दुल्हन का श्रृंगार हो गया

मुखड़े पर लज्जा का आँचल  !


सहज मैत्री, विश्वास, आस्था 

आभूषण शोभित करते तन, 

करुणा, ममता और सरलता 

से ढँका-ढँका मन का हर कण !


ले चल प्रिय गृह आतुर इसको 

मधु शीत पवन की डोली में, 

नभ देखता नक्षत्रों संग 

 सूर्य-चन्द्र साक्षी बन आये !


शुक्रवार, जनवरी 17

प्रेम


प्रेम 


एक-दूजे को समझते हुए 
एक दूजे को ऊपर उठाते हुए 
साथ-साथ जीने का नाम ही प्रेम है 
अहंकार तज कर हँसते-हँसते हर मान-अपमान को 
सहने का नाम ही प्रेम है 
दूसरे को प्रीतिकर हों ऐसे वचन ही मुख से निकलें 
इस सजगता का नाम ही प्रेम है 
सब कुछ साझा है इस जहाँ में 
हर कोई जुड़ा है अनजान धागों से,
धरा, गगन, पवन, अनल और सलिल के साथ 
जुड़ाव महसूस करने का नाम ही प्रेम है 
मैत्री और साहचर्य का आनन्द लेने और बाँटने का नाम ही प्रेम है 
मुक्त है यह प्रेम एकाधिकार से, दुःख और घृणा से 
जो बाँधता नहीं मुक्त करता है 
अनंत से मिलाने का दम रखता है 
अंतर में शांति और आनंद भरता है 
एक समन्वय, सामंजस्य और बोध का नाम ही प्रेम है !  

शुक्रवार, अगस्त 31

उन सभी युवाओं को समर्पित जो विवाह बंधन में बंधने वाले हैं




 यह बंधन तो प्रेम का बंधन है 

बचपन से किशोर फिर युवा होते तन
फिर भी रहे वही बच्चों वाले प्यारे से मन
उन्हीं मासूम मनों के बंधन में बंधे हो तुम दोनों
एक-दूसरे का सम्बल बनकर
देखभाल और परख कर
खूबियाँ और कमियां
सहकर छोटी-बड़ी कमजोरियां
संग-संग चलने का निर्णय है तुम्हारा
बनना चाहते हो हर सुख-दुःख में
इकदूजे का सहारा
निष्ठा और समर्पण
 इन दो स्तम्भों पर टिका है यह बंधन
कुछ अधिकारों और कुछ कर्त्तव्यों का करना है निर्वाह
मैत्री और साझेदारी का नाम है विवाह
सुनहरे भविष्य की नींव है यह प्रथा
मिटाती है दिलों से अधूरेपन की व्यथा
दो नहीं अबसे एक हो तुम
दो ‘मैं’ से मिलकर बना है एक समर्थ ‘हम’
विवाह की पावनता को बरकरार रखना
सदा दूजे को दिया करार रखना
थोड़े में कहें तो अधरों पर मुस्कान
और दिल में ढेर सारा प्यार रखना !


मंगलवार, सितंबर 16

पल-पल सत्य प्रकट हो रहा

पल-पल सत्य प्रकट हो रहा  



दुःख की काली चादर जैसे
रात कोई अंधियारी घोर,
राह नजर न आती जिसमें 
नहीं क्षितिज का दिखता छोर !

कितने अश्रु छिपे हुए थे
बाहर आने को थे आतुर,
गूँज रहे थे अंतर्मन में
जाने कैसी पीड़ा के स्वर !

सुख बस एक छलावा निकला
दुःख ही जीवन का आधार,
खुशियाँ जग को नहीं सुहातीं
दुःख में खिलता है संसार !

आंसू देख देख मुस्काए
ऐसी रीत यहाँ चलती है,
ऊपर ऊपर ही मैत्री
अंतर में नफरत पलती है !

जीवन की यह उहापोह जो
मथ डाले मन का हर कोना,
पीड़ा में जो स्वयं तपता हो
वह है बस एक स्वप्न सलोना !

कोमल उर को छलनी करते
पीड़ा ही जग में बाँटें,
पल-पल सत्य प्रकट हो रहा  
सदा फूल संग होते कांटें !

इतने बरसों बाद मिली है
पर जानी पहचानी सी है,
दुःख की छाया मिथ्या ही हो
पर न यह अनजानी सी है !

ग्रस डाला है आखिर इसने
 राहु बन कर उजियारे को,
कब छूटेगी इससे काया
मुक्ति मिलेगी मन हारे को !

थोड़ा सा जो भीतर था मन
वह भी इसकी भेंट चढ़ेगा,
अब तक जिसको थामा उर ने
हर विचार वह बह निकलेगा !