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शुक्रवार, जुलाई 10

शिवालय

शिवालय 


कोई कहता है 

शिव के भीतर प्रेम है 

जैसे कि शिव और प्रेम हों

 दो अलग-अलग वस्तुएँ 

असल में प्रेम ही शिव है  

जब भीतर जागता है प्रेम 

मन ख़ाली हो जाता है 

सारे भेद मिट जाते हैं 

श्वासें गढ़ती भीतर 

वह मंदिर

 जिसमें शिव विराजमान होते
पूरक देह में स्थान बनाती  

रेचक मन की थिरता को दृढ़ करती 

पूरक है आत्मा का जीवन

रेचक संसार का 

दोनों के मध्य 

शिव का वास है 

जो उसमें जागेंगे 

वे जानेंगे !

 

मंगलवार, जून 9

सपनों का संसार

सपनों का संसार 



 वृद्ध हो जाता है इंसान

पर जलती रहती है 

कामना की आग 

वैराग्य नहीं सधता 

अब वृद्ध जनों को 

यात्रा जगत की चलती रहती है 

जहाँ उम्र के अनुसार ही व्यवहार होता है 

उसी परिपक्व बुद्धि में प्यार होता है !

 

चावल पक गये हैं 

फिर भी आग नीचे जल रही है 

सोचने वाली बात है 

या तो जलेंगे या अधिक गल जाएँगे !


बोध हो गया है 

पर चलती रहती है साधना 

संतोष नहीं होता 

साधकों को 

खोज ईश्वर की चलती रहती है 

जहाँ नदी पार करके नाव छोड़ दी जाती है 

उसी परिपक्व बुद्धि को सिद्धि दी जाती है !




रविवार, जून 22

सपना और संसार

सपना और संसार 

उनकी सांसें आपस में घुल गयी हैं
मन भी हर क्षण जुड़ता है
और अब पकड़ इतनी मजबूत हो गयी है कि
दुनिया की बड़ी से बड़ी तलवार भी इसे काट नहीं सकती
कोई किसी को यूँ ही नहीं सौप देता
अपना आप, अपनी आत्मा
प्यार के अनमोल खजाने को पाकर ही 
अपना सब कुछ खाली कर दिया है
किसी के नाम लिख दिया है मन को
फिर सपने सा क्यों लगता है कभी–कभी संसार
शायद इसलिए कि यहाँ सब कुछ बदलने वाला है

रविवार, मार्च 16

प, फ, ब, भ, म

प, फ, ब, भ, म


प-वर्ग में आकर बसते हैं 

सारे रिश्ते जो भाते हैं, 

परम परमात्मा, भगवान भी 

पंचम सुर में ही गाते हैं !


प औ’ म के मध्यांतर में इक 

रिश्तों का संसार बसा है, 

प से पिताजी और म से माँ 

इनसे ही परिवार बना है !


प से पत्नी, प्रियतम भी प से 

फ से फूफी-फूफा कहाते, 

ब बना बहना, बिटिया, बेटी 

भ भाई का भाभी भी भ से !


मामा-मामी, मौसा-मासी 

माँ सम  ममता सदा लुटाते, 

भ से भार्या, भगिनी भी भ से 

ब से बुआ व बहू बन जाते !


शनिवार, जून 15

जीवन रहे बुलाता हर पल

जीवन रहे  बुलाता हर पल


​​भीतर इक संसार दूसरा 

शायद  यह जग कभी न जाने, 

इस जीवन में राज छिपे हैं 

लगे सभी हैं जिन्हें छिपाने !


लेकिन इसी अँधेरे में इक 

दीप जला करता है निशदिन, 

देख न पाते, कहीं दूर है 

खुला जो नहीं तीसरा नयन !


कोई कहाँ जान सकता है 

मन की दुनिया बड़ी निराली, 

यूँ ही नहीं सुनाते आगम 

अंधकार ने ज्योति चुरा ली !


फिर भी यह श्वासें चलती हैं 

चाहे लाख तमस ने घेरा, 

 कैसे अर्थवान हो जीवन 

इसी प्रश्न ने डाला डेरा !


कोई पीछे खड़ा हँस रहा 

जीवन रहे बुलाता हर पल, 

रंग-बिरंगी इस दुनिया की 

याद दिलाती है हर हलचल !  


कितना गहरे और उतरना 

 अभी सफ़र बाकी है कितना, 

जहां पुष्प प्रकाश के खिलते 

जहाँ बसा अपनों से अपना ! 


बुधवार, मार्च 27

जीना है जीवन भूल गए


जीना है जीवन भूल गए  


जब संसार सँवारा हमने 

मन पर धूल गिरी थी आकर, 

जग पानी पी-पी कर धोया 

मन का प्रक्षालन भूल गए !


नाजुक है जो, जरा ठेस से 

आहत होता, किरच चुभे गर, 

दिखता आर-पार भी इसके 

यह बना कांच से भूल गए !


तुलना करना सदा व्यर्थ है 

दो पत्ते भी नहीं एक से, 

व्यर्थ स्वयं को तौला करते 

जीना है जीवन भूल गए ! 


बना हुआ अस्तित्व, मिला सब 

दाता ने है दिया भरपूर, 

खो नहीं जाए लुट न जाए 

चैन की बांसुरी भूल गए !


इक दिन सब अच्छा ही होगा 

यही सोचते गई उमरिया,  

मधुर विनोद, साथ स्वजनों का

है सदा निकट यह भूल गए !

रविवार, जनवरी 29

गुंजार

 गुंजार 


तू भेज रहा है प्रेम पाती 

हर क्षण  मेरे प्रभु !

हम पढ़ते ही नहीं 

क्योंकि संसार की

उलझनों में खोए हैं 

तू जगा रहा है निज गुंजार से 

और हम न जाने

किन अंधेरों में सोए हैं 

एक क्षण के लिए

तुझसे नयन मिलते हैं तो 

हज़ार फूलों की

डालियाँ झर जाती हैं 

तेरी याद में 

पवन अपने संग 

उन अदृश्य फूलों का

पराग ले आती है 

शुक्रिया तेरे उस स्पर्श का 

जो भर जाता है

मन में पुनः विश्वास 

थिर हो जाती है

आती-जाती हर श्वास ! 


मंगलवार, अक्टूबर 27

हम और अस्तित्व

हम और अस्तित्व

 

हम वह वृक्ष बन सकें

जो हजारों का भला करता है

छाँव देता और उनकी क्षुधा हरता है

या बनें बाँसुरी जो खाली है भीतर से

पर अस्तित्व के अधरों से लगकर

मधुर संगीत जिससे उपजता है

हमारे भीतर से हम जब लुप्त हो जाते हैं

सारा संसार समा  जाता है

हवाएं बहने लगती हैं

शक्ति का प्रवाह ऊपर से गिरता है

जैसे शंकर की जटाओं में सिमट जाती है गंगा

बहती है वह जग की तृषा हरने

गौरी धरती है भीषण काली का रूप

सहना होगा जिसे असुरों का आक्रमण

हजार विरोध भी, पर वहाँ कोई नहीं होगा

जो अपमानित हो सके तिल भर

हमें भी बनना होगा मसीहा

छोटा या बड़ा  

क्योंकि अंतरिक्ष समेटे है हर कोई अपने भीतर !

  

सोमवार, जून 1

एक जागरण ऐसा भी हो


एक जागरण ऐसा भी हो 

संसार के होने का यही ढंग है 
यहाँ कहीं विषाद कहीं उमंग है 
चिताएँ जलती हैं जहाँ 
निकट ही उत्सव मनता है 
देखे इस दुनिया के विचित्र रंग हैं 
यहाँ चढ़ते सूरज को ही 
सब प्रणाम करते हैं 
कन्धों पर बिठा विजयी की ही 
यहाँ जय जयकार होती 
जिसे खड़ा होने को चाहिए सहारा 
उस पराजित को सब अस्वीकार करते हैं 
समर्थ खड़े होते हैं समर्थों के साथ 
केवल एक वही कहलाते हैं दीनों के नाथ 
पर उन तक पहुँच कहाँ है असमर्थों की 
वे अपने ही अभावों में डूब  रहे हैं दिन-रात !
परमात्मा के होने का ढंग ही निराला है 
संकल्प मात्र से उसने 
यह सारा आयोजन रच डाला है 
उसकी रीत देने की है वह यही सिखाता है 
उसका सान्निध्य पाकर मीरा नाचती 
कोई कबीर गाता है 
वह हमें देता है, उसके बन्दों के बहाने 
हम उसे लौटाते हैं 
प्रीत का खेल लेन-देन का खेल है 
यहाँ एक्य अनुभव करना  
दो का ही मेल है 
वहाँ बटोरने की चाह है 
यह लुटाने की राह है 
वहाँ ज्ञानी बनने में सुख है 
यहाँ अबोधता न होना ही दुःख है 


सोमवार, मई 18

आदि - अंत

आदि - अंत 

आदि में 'एक' ही था 
'एक' के सिवा दूसरा नहीं था 
फिर विभक्त किया उसने स्वयं को 'दो' में 
एक वामा कहलायी, बांये अंग में बैठने वाली 
दूसरा अथक श्रम से सृष्टि का संधान करने वाला 
दोनों में कोई छोटा-बड़ा न था 
एक प्रेम की मधुर रस धार थी 
एक घर बनाकर प्रतीक्षा करती 
दूसरा दुनिया जहान से पदार्थ लाता 
वह सेविका बनकर भी मालकिन थी 
वह स्वामी बनकर भी याचक था 
तब जीवन सहज था क्योंकि 
विरोधी पक्ष एक दूसरे में समाहित थे 
काल की धारा में सब बदलने लगा 
एक विस्तार पाता गया जितना 
घर से दूर होता गया 
प्रेम को बंधन मानकर तिरस्कार किया 
दूसरी भी अपमान से कुंठित हुई 
नए-नए रूप धर  लुभाने लगी 
जीवन खंड-खंड हो गया 
प्रेम ही है घर का आधार 
यदि न बचे तो बिखर जाता है संसार !

सोमवार, जून 3

अपने आप



अपने आप


सुबह आँख खुलते ही
झलक जाता है संसार भीतर  
कानों में गूँजती है कोयल की कूक
हवा का स्पर्श सहला जाता है गाल को आहिस्ता से
कोई जान रहा है हर बात को बिलकुल उसी तरह
जैसे सागर किनारे खड़ा तकता हो लहरों को !

पेट में हलचल होती है क्षुधा से
तो हाथ कुछ डालते हैं मुख में
सूखे गले को जल का स्पर्श भाता है
हाथ संवार देते हैं बिखरे हुए घर को
कदम चल पड़ते हैं दफ्तर की ओर
कोई जान रहा है हर शै को बिलकुल उसी तरह जैसे
अम्बर तले तकता हो उड़ते हुए बादलों को !

मन सोचता है कभी बीती बातें
कभी सपने सजाता है भविष्य के
योजनायें बनाता और बदलता है
कभी डरता और झुंझलाता है
कोई जान रहा है हर ख्याल को बिलकुल उसी तरह जैसे
माँ देखती है चलना सीखते हुए बच्चे को !

लहरें बनती और बिगड़ती हैं
बादल आते और जाते हैं
बच्चा गिर कर संभलता है
हो रहा है न सब अपने आप
बिना किसी करने वाले के ?

मंगलवार, मई 22

एक लघु कहानी



काश !

आज फिर मीता मुँह फुलाए बैठी थी. भाभी ने उसे स्कूल न जाने पर डाँटा था. आजकल उसे स्कूल जाने से ज्यादा सुंदर वस्त्र पहन कर शीशे में स्वयं को निहारना अच्छा लगने लगा था. उसने भाभी को भाई से कहते सुना था, मीता अब बड़ी हो रही है उसे इधर-उधर यूँही नहीं घूमना चाहिए. तब से भाभी की हर बात उसे बुरी लगने लगी थी. पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता तो वह क्या करे. माँ की आँखों की रौशनी कम होने लगी थी, उनकी एक आँख तो पहले से ही खराब थी अब दूसरी से भी कम दिखाई देता था. पिता अधिकतर समय के बाहर ही बिताते थे, वह एक छोटे से व्यापारी थे. घर की सारी जिम्मेदारी भाभी की थी. उनकी गोद में एक नन्हा सा पुत्र भी था पर वह सास-ससुर, दोनों देवरों और ननद की देखभाल भी ठीक से कर रही थी. यह उन दिनों की बात है जब भारत देश नया-नया आजाद हुआ था.

छमाही परीक्षा में जब वह पास नहीं हुई तो भाई ने उसे बुलाकर पूछा. मीता ने स्पष्ट कह दिया, अब वह आगे नहीं पढ़ेगी. चाहें तो उसका ब्याह करवा दें. अभी वह पन्द्रह वर्ष की भी नहीं हुई थी, आठवीं में ही पढ़ रही थी. भाई ने दफ्तर के एक सहकर्मी से बात की तो उसने कहा, मेरा भाई अभी-अभी नौकरी से लगा है, हम भी उसके लिए लड़की देख रहे हैं. बात पक्की हो गयी और विवाह हो गया. मीता के पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे. पर पति का काम ऐसा था जिसमें उसे टूर पर जाना पड़ता था. एक महीना साथ रहकर वह बाहर चला गया, मीता की तबियत खराब रहने लगी. पहले-पहल उसे कुछ समझ में नहीं आया पर बाद में पता चला वह गर्भवती थी. वर्ष पूरा होने से पहले ही एक कमजोर और सांवली सी बालिका को उसने जन्म दिया. वह स्वयं गोरी-चिट्टी थी, पहले तो बच्चे की उसने चाहना ही नहीं की थी, उसे तो सज-धज कर घूमना था, अब इस सांवली बच्ची को देखकर उसे लगा, शायद अस्पताल में किसी अन्य के साथ यह बदल गयी है. अपनी उपेक्षा से दुखी होकर दिन भर रोती रहने  वाली उस बच्ची की देखभाल वह ठीक से नहीं कर पाती थी. समय बीतता रहा, एक पुत्र और हुआ, फिर पांच वर्षों के बाद दूसरा पुत्र, जो बचपन से ही किसी न किसी रोग का शिकार होता रहा. इसके बाद भाभी ने ही अस्पताल ले जाकर मीता का ऑपरेशन करवा दिया. अपना बचपन छिन जाने का दुःख था या कौन सा क्रोध था, वह अपना गुस्सा बच्चों पर निकालने लगी. उन्हें रगड़-रगड़ कर नहलाती जब तक कि उनका तन लाल न हो जाता. साबुन लगाने से कहीं त्वचा का रंग बदलता है पर इन्सान के मन को कौन समझ पाया है. बच्चे पढ़ाई में भी कमजोर ही रहे, माँ यदि स्वयं पढ़ी-लिखी या समझदार न हो तो बच्चों की सहायता नहीं कर सकती. हाईस्कूल में बेटी असफल रही तो उसे घर बैठा दिया, और प्राइवेट परीक्षा देने को कहा. डिग्री तक आगे की सभी पढ़ाई उसने घर से ही की.  उसी समय से उसके लिए लड़का भी देखा जाने लगा. पुत्र भी कालेज में आ गया था तभी एक जगह बात पक्की हो गयी और बिटिया को विदा कर दिया. ससुराल में बेटी बहुत खुश थी, उसके भी तीन बच्चे हुए पर पचास की होने से पहले ही वह स्वर्ग सिधार गयी. उसे अपने पिता और भाई के देहांत का दुःख सता रहा था जो दस वर्ष का बेटा और पत्नी को छोड़कर अचानक ही स्वर्ग सिधार गया था. मीता पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, पुत्र की मौत का गम न सह पाने के कारण ही शायद पतिदेव ने भी वही राह पकड़ ली थी. अभी उसके पति की मृत्यु हुए ज्यादा समय नहीं गुजरा था, कि पहले बेटी की असाध्य बीमारी और फिर मृत्यु का समाचार उसे मिला. उसे स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि इतना दुःख पाने के बाद भी वह सही-सलामत है. बड़ी बहू, पोता, छोटा पुत्र और उसका परिवार साथ में था. वे सभी उसकी देखभाल करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते थे. उसका मन अब संसार से ऊबने लगा था और ज्यादा समय वह सत्संग में बिताने लगी थी. सुबह हो या शाम जब भी समय मिलता वह आस-पास होने वाले किसी न किसी कथा सम्मेलन में पहुंच जाती. इसी तरह एक दिन जीवन की शाम आ गयी थी. अस्वस्थता ने उसे अस्पताल पहुंचा दिया था. सफेद दीवारों वाले सूने कमरे में अकेले बिस्तर पर लेटे हुए उसे अपना बचपन याद आ रहा था. काश ! वह पढ़ाई के महत्व को समझती होती तो उसका जीवन कुछ और ही होता. उसके बच्चे भी शायद इसी कारण उच्च अध्ययन नहीं कर पाए. परिवारजनों को याद करते हुए और उन्हें मंगल कामनाएं देते हुए उसने आखें मूँद लीं.

गुरुवार, अप्रैल 12

पल-पल सरक रहा संसार



पल-पल सरक रहा संसार

कौन यहाँ किसको ढूंढे है 
किसे यहाँ किधर जाना है,
खबर नहीं कण भर भी इसकी 
पल भर का नहीं ठिकाना है !

जोड़-तोड़ में लगा है मनवा
बुद्धि उहापोह में खोयी,
हर पल कुछ पाने की हसरत 
जाने किस भ्रांति में सोयी !

दिवास्वप्न निरन्तर देखे 
मन ही स्वप्न निशा में गढ़ता,
नहीं मिला आधार स्वयं का 
लक्ष्यहीन सा रहे विचरता !

एक तिलिस्म महामाया का 
घुमा रहा जिसको करतार
एक व्यूह में भ्रमण चल रहा 
पल-पल सरक रहा संसार !