दुलियाजान में गुरूजी
सूरज, गगन, धरा, वट, पंछी
पुलकित होकर हुए तृप्त हैं,
इक ही सुर में सब गाते हैं
उसी की चाहत जो मुक्त है !
मुक्त सदा जो हर बंधन से
दुःख, पीड़ा, क्षुद्र अंतर से,
सुख, शांति, आनंद स्वरूप वह
चिन्मय हो आया कण-कण से !
वह जो करुणा रूप बुद्ध का
झलकाए नानक की मस्ती,
मस्त हुआ है जो कबीर सा
गूंज रहा बन कृष्ण बांसुरी !
मीरा सी है भक्ति ह्रदय में
महावीर सा ज्ञान अनूठा,
शंकर का अद्वैत पी गया
रामकृष्ण सी सहज सरलता !
फौलादी विश्वास का अधिप
फूल सा मृदुल बालक जैसा,
प्रखर बुद्धि अद्भुत योगी है
स्नेह लुटाता पालक जैसा !
चकित हुए सब दीवाने भी
सबके दिल में घर कर लेता,
दुलियाजान बिछाये पलकें
राह उसी की देखा करता !
अनिता निहालानी
२१ फरवरी २०१०
दुलियाजान, असम
