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बुधवार, मई 17

किताब ज़िंदगी की

किताब ज़िंदगी की 


मुस्कुराओ कि अभी ज़िंदा हो 

आख़िर किस बात पर शर्मिंदा हो 

हाथ थामा है जब उसने 

आगे बढ़कर, 

परवाज़ लगाओ

 मानो कोई परिंदा हो 

रूह तो क़ैद नहीं, उसकी सुनो 

अमन औ” चैन के नये ख़्वाब बुनो !

ज़िंदगी किताब कोरी सी 

हर रात हो जाती,  

हर सुबह नया इक नाम चुनो !

ओढ़ रखा है क्यों मायूसी का

 लबादा सिर पर 

जब डोर बांधी है जन्नतों से दिल की 

कोई सागर पास ही उफनता है 

नाच सकते हो जिसकी लहरों पर 

चाँद छूने का बस इक इरादा ही काफ़ी  

दिल की गहराइयों से जो निकला हो 

श्वासें न खर्च हों समेटते उदासियों को

जबकि हाथ कोई प्यार से सिर पर रखे  ! 


मंगलवार, जून 25

गीत कोई कसमसाता



गीत कोई कसमसाता



नील नभ के पार कोई
मंद स्वर में गुनगुनाता,
रूह की गहराइयों में
गीत कोई कसमसाता !

निर्झरों सा कब बहेगा
संग ख़ुशबू के उड़ेगा,
जंगलों का मौन नीरव
बारिशों की धुन भरेगा !

करवटें ले शब्द जागे
आहटें सुन निकल भागे,
हार आखर का बना जो
बुने किसने राग तागे !

गूँजता है हर दिशा में
भोर निर्मल शुभ निशा में,
टेर देती धेनुओं में
झूमती पछुआ हवा में !

लौटते घर हंस गाते
धार दरिया के सुनाते,
पवन की सरगोशियाँ सुन
पात पादप सरसराते !

गीत है अमरावती का
घाघरा औ' ताप्ती का, 
कंठ कोकिल में छुपा है
प्रीत की इक रागिनी का !


सोमवार, अगस्त 5

ओट में पर्दे की बैठे


ओट में पर्दे की बैठे

दिल पे कितना बोझ धारे
चल रहे हम  

कुछ तमन्नाएँ अधूरी
आरजू जो हुई न पूरी
कुछ पूरानी दास्तानें
अनपढ़े से कुछ फसाने 
भीड़ कांधों पर संभाले, बस यूँ ही तो
ढल रहे हम  

बेबसी के पल वे सारे
ढूँढ़ता था मन सहारे
पास होकर दूर हर जन
जिस घड़ी मजबूर था मन
लाश ढोते भूत की, स्वयं को ही
छल रहे हम  

रूह में थी छाप उनकी
खो गयी अब थाप जिनकी
छुपे पर वे सब वहाँ थे 
ओट में पर्दे की बैठे
आ खड़े होते वे सम्मुख, जब जरा सा
जल रहे हम