किताब ज़िंदगी की
मुस्कुराओ कि अभी ज़िंदा हो
आख़िर किस बात पर शर्मिंदा हो
हाथ थामा है जब उसने
आगे बढ़कर,
परवाज़ लगाओ
मानो कोई परिंदा हो
रूह तो क़ैद नहीं, उसकी सुनो
अमन औ” चैन के नये ख़्वाब बुनो !
ज़िंदगी किताब कोरी सी
हर रात हो जाती,
हर सुबह नया इक नाम चुनो !
ओढ़ रखा है क्यों मायूसी का
लबादा सिर पर
जब डोर बांधी है जन्नतों से दिल की
कोई सागर पास ही उफनता है
नाच सकते हो जिसकी लहरों पर
चाँद छूने का बस इक इरादा ही काफ़ी
दिल की गहराइयों से जो निकला हो
श्वासें न खर्च हों समेटते उदासियों को
जबकि हाथ कोई प्यार से सिर पर रखे !
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