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गुरुवार, दिसंबर 30

नए वर्ष में नए स्वप्न हों

नए वर्ष में नए स्वप्न हों 


उजाला ही उजाला हर सूँ 

हम आँखें मूँदे बैठे है, 

प्रकृति-पुरुष का नर्तन चलता 

हम अँधियारे में बैठे हैं !


शिव का तांडव लास्य उमा का 

दोनों  साथ-साथ चलते हैं,  

भूकंप कहीं तूफां भीषण 

कहीं सुगंधित वन खिलते हैं !


यह सृष्टि बनी  है क्रीडाँगन 

दिव्य चेतना शुभ मेधा की, 

नित्य नवीन रहस्य खुल रहे 

है अनंत प्रतिभा दोनों की !


हो जाए लय मन इस क्रम में 

श्वास-श्वास यह भरे प्रेम से, 

यही ऊर्जा बिखर चमन में 

भाव तरंग, वाणी, कृत्य से !


नए वर्ष में नए स्वप्न हों 

नव उमंग कुछ नया हर्ष हो, 

छोड़ दिया जिसको  भी पथ में 

साथ उसे लें यह विमर्श हो !