समीर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समीर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, फ़रवरी 12

‘कुछ’ न होने में ही सुख है





‘कुछ’ न होने में ही सुख है 


‘कुछ’ होने की जिद में अकड़ा
फिर-फिर दुःख को कर में पकड़ा,
इक उलझन में हरदम जकड़ा
 क्यों न हो दिल टुकड़ा-टुकड़ा !

कुछ होकर भी देख लिया है
कुछ भी जैसे नहीं किया है,  
तृषित अधर सागर पिया है
 दिल का दामन नहीं सिया है !

‘कुछ’ ना होने में ही सुख है
मिट जाता जन्मों का दुःख है,
मुड़ा जिधर समीर का रुख है
सब उसका जो अंतर्मुख है !

सब कुछ ही हो जाना होगा
भेद हरेक मिटाना होगा,
लब पर यही तराना होगा
दिल तो वहीं लगाना होगा !

गुरुवार, जुलाई 4

नया जब दिन उगा

नया जब दिन उगा


नूतन उच्छ्वास भरें
श्वासों में हर्ष के,
नया सा दिन उगा
वृक्ष पर वर्ष के !

आशा कुम्हलायी जो
बंधी अभी छोर में ?
 लिए बासी मन जगे
क्यों कोई भोर में ?

ताजा समीर बहे
क्षमता भी बढ़ी है,
कल से आज तलक
उम्र सीढ़ी चढ़ी है !

जैसा भी हो समय
नया उत्कर्ष हो,
हँसी की गूंज सदा
बीते दिन अमर्ष के !

नया जब दिन उगे  
वृक्ष पर वर्ष के !