आदमी
राहबर आये हजारों इस जहाँ में
आदमी फिर भी भटकता है यहाँ पर !
आदमी फिर भी भटकता है यहाँ पर !
बेवजह सी बात पर भौहें चढ़ाता
राह तकता है भला बन शांति की फिर
राह तकता है भला बन शांति की फिर
आदतों के जाल में जकड़ा हुआ पर
किस्से मुक्ति के सुनाता जोश भर कर
किस्से मुक्ति के सुनाता जोश भर कर
खुद ही गढ़ता बुत उन्हीं से मांगता
जाने कितने स्वांग भरता भेष धर कर
जाने कितने स्वांग भरता भेष धर कर
इस हिमाकत पर न सदके जाये कौन
हर युद्ध करता शांति का नाम लेकर !
हर युद्ध करता शांति का नाम लेकर !
उल्टे-सीधे काम भी सभी हो रहे
है रात-दिन जब मौत का जारी कहर !
है रात-दिन जब मौत का जारी कहर !
