मंगलवार, जून 16

अनगाया यदि रहा गीत

अनगाया यदि रहा गीत 


अनगाया यदि रहा गीत जो 
गाने आये थे हम भू पर, 
खिला नहीं यदि सरसिज उर में 
मिले नहीं उड़ने को दो पर !

मधुऋतु अगर न मन में उतरी 
फूटी नहीं हृदय की गागर, 
सूना रहा घाट उर सर का 
मन्दिर के द्वारे तक जाकर !

अंतर में यदि नहीं लालसा 
चाह नहीं यदि जगी मिलन की,
कैसे कारागार खुलेगा 
कैसे गूँजेंगे अनहद स्वर !

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 17 जून जून 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 3736
    में दिया गया है। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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  3. बहुत सुन्दर ....
    इस अनहद माद को सुन सकें तो जीवन में स्वर लहरी और ताल इश्वर के डमरू से मिल जाए ... शयद इसी लिए हम भी आए हैं सृजित हो कर ...

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  4. अनहद स्वर यदि सुनाई दे गए तो जीवन आंनद में डूब जाता है
    सुन्दर काव्य

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