मंगलवार, फ़रवरी 10

चक्र सृष्टि का

चक्र सृष्टि का 


पाँच बज गये 

भोर हो गई 

धरा के इस भाग ने मुख मोड़ लिया हैं

सूरज की ओर

धीरे-धीरे उजाला होगा 

अलसाये, उनींदे बच्चे जागेंगे 

मंदिरों में शंख व घंट नाद होंगे 

भोर में करेंगे किसान रूख खेतों का 

महिलाएँ चौके का 

और बच्चे स्कूलों का 

धरा और सूरज जब आमने-सामने होंगे 

प्रखर प्रकाश ज़ाहिर कर देगा 

हर कतरा कोना

सब कुछ स्पष्ट नज़र आएगा 

लोग घरों में छुप जाएँगे 

ताप का सामना कौन करे 

सत्य का प्रकाश ऐसा ही होता है 

चमकदार प्रखर तेज 

खिड़कियों पर पर्दे लग जाएँगे 

कड़कती धूप में ख़ाली हो जाएँगीं सड़कें 

धरा फिर घूम  जाएगी जरा

गोधूलि की बेला में 

बगीचे किलकारियों से भर जाएँगे 

जब घूमते-घूमते सूरज से दूर जाएगी 

धुँधलका छायेगा संध्या का 

फिर अंधकार का साम्राज्य और लोग 

घरों में बंद हो नींद के आग़ोश में खो जाएँगे 

यह एक चक्र प्रकृति का 

न जाने कब से चल रहा है 

सूरज और धरती के इस प्रेम में 

हर प्राणी पल रहा है !


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