सोमवार, जून 14

पूर्ण गगन प्रतिबिम्बित जिसमें

पूर्ण गगन प्रतिबिम्बित जिसमें 


ठहर गया प्रमुदित मन-अंतर

नयन मुंदे, अधर मुस्काते,

परम बुद्ध  की शुभ मूरत पर 

लोग युगों से वारी जाते !


मोहक मुद्रा अभय बरसता 

थिर हो जैसे सर्वर दर्पण, 

पूर्ण गगन प्रतिबिम्बित जिसमें 

चमकें चन्द्र और तारा गण !


मीलों भटक-भटक  राही को 

जैसे कोई ठाँव मिल गया, 

जंगल-जंगल घूम रहा था 

आखिर सुंदर गाँव मिल गया !


क्या पाया जब पूछा जग ने 

बुद्ध हँसे,  कुछ नहीं कमाया, 

बोझ लिए फिरता था मन जो  

एक-एक कर उन्हें बहाया !


है हल्का उर उड़े गगन में 

कभी कोई न तृषा सताये, 

चाह मिटी तो जग पीछे था 

करुणा सहज परम बरसाए !



 

7 टिप्‍पणियां:

  1. ठहर गया प्रमुदित मन-अंतर

    नयन मुंदे, अधर मुस्काते

    बहुत खूब

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  2. बुद्ध की भंगिमा बहुत मन मोहक है, वही शीलतता आपके शब्दों मे छलक उठी है.

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  3. मन में कहीं गहरे उतर गई आपकी रचना,सुंदर रचना।

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