बुधवार, जून 23

कुसुमित हुआ हो जैसे बीज


कुसुमित हुआ हो जैसे बीज

एक ऊर्जा है अनाम जो
खींच रही सदा अपनी ओर,
पता ठिकाना कौन जानता  
जिगर दीवाना जिसका मोर !

प्रेम उमगता भीतर आता
कहाँ से ? यही खबर न मिलती,
जिसकी तरफ उमड़ती धारा
जरा भनक ना उसकी पड़ती !

हृदय पिघलकर बहता जाता
राहें नहीं नजर आती है,
‘मैं’ खोया अशेष ‘वह’ कैसे
उसकी छाया मिट जाती है !

कण-कण में मधु बिखरा जिसका
कैसे एक दिगंत समाए,
हर इक घड़ी अमी बन जाती 
मिटकर ही अनंत को पाए !

तृप्त हुआ फिर डोले उर यह
कुसुमित हुआ हो जैसे बीज,
मंजिल पर ज्यों राह आ मिली
छूट गयी पथ-सफ़र की प्रीत !


15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24-06-2021को चर्चा – 4,105 में दिया गया है।
    आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद सहित
    दिलबागसिंह विर्क

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  2. तृप्त हुआ फिर डोले उर यह
    कुसुमित हुआ हो जैसे बीज,
    मंजिल पर ज्यों राह आ मिली
    छूट गयी पथ-सफ़र की प्रीत !
    वाह!!!
    जीवन सफर की मोह भी तब छूटेगा जब मोक्ष के करीब होंगे...।
    बहुत ही लाजवाब।

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  3. एक ऊर्जा है अनाम जो
    खींच रही सदा अपनी ओर,
    सच !ऊर्जावान ह्रदय मंज़िल पा जाता है !!

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  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

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  5. सुमन जी, सुधा जी, अनुपमा जी व ज्योति जी स्वागत व आभार !

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  6. तृप्त हुआ फिर डोले उर यह
    कुसुमित हुआ हो जैसे बीज,
    मंजिल पर ज्यों राह आ मिली
    छूट गयी पथ-सफ़र की प्रीत !

    आध्यात्मिक गहरे मर्म समेटे हुए बहुत ही सुंदर सृजन अनीता जी,सादर

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  7. बहुत सुंदर एक अनाम उर्जा तो है जरूर, उसी उर्जा को सचमुच नमन।
    सुंदर सृजन।

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  8. कामिनी जी, भारती जी, कुसुम जी, व विश्वमोहन जी आप सभी का स्वागत व आभार!

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  9. ये अनाम ऊर्जा स्वयं से जनम लेती है और स्वयं को प्रेरित करती है ...
    हिरन की म्रिग्माया जैसे है ...

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  10. तृप्त हुआ फिर डोले उर यह
    कुसुमित हुआ हो जैसे बीज,
    मंजिल पर ज्यों राह आ मिली
    छूट गयी पथ-सफ़र की प्रीत !
    ...प्रेरणा देती सुंदर रचना।

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