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शुक्रवार, अप्रैल 4

भोर

भोर 


 

एक और सुबह 

लायी है अनंत संभावनाएँ 

उससे मिलने की 

अभीप्सा यदि तीव्र हो तो 

कृपा बरसती है अनायास 

खुल जाता है हर द्वार 

झरते हैं प्रकाश पुष्प हज़ार 

वही ज्योति बनेगी मार्गदर्शक 

जगमगा उठेगा कुछ ही देर में 

रवि किरणों से फ़लक 

जग जाएँगे वृक्ष, पर्वत, फूल सभी 

काली पड़ गई धूल सभी 

हर भोर उस सुबह की 

याद दिलाती है 

जिसमें जगकर आत्मा

 नयी हो जाती है !




सोमवार, नवंबर 6

दिवाली आयी लिए ख़ुशियाँ

दीपावली और भाईदूज पर 

हार्दिक शुभकामनायें 

घर-बाहर निर्मल प्रकाश मय 

दिप-दिप दीप जलें हर आँगन, 

स्वच्छ चमकता हो हर कोना 

भर जायें  ख़ुशियाँ हर दामन !


द्वार सजा हो रंगोली से 

दीपक जलते हों चौबारे, 

दिवाली आयी लिए ख़ुशियाँ 

जगमग करतीं हो दीवारें !


रहे धरा पर नहीं तमस अब 

माँ लक्ष्मी का लगेगा फेरा, 

जहां सरसता हो जीवन में 

वहीं लगायेंगी वह डेरा !


जहाँ बँटे हर भाव ह्रदय का

 शेष रहे जब शून्य कृपणता,

अनजाने नहीं पथ रह जायें

बिखरे प्रेम सुरभि के जैसा !

 

पर्व अनोखा ले आता फिर 

भाईदूज- प्रीत का बंधन, 

केसर, अक्षत, रोली टीका 

या मस्तक पर महके चंदन !


जीवन पथ हो सदा प्रकाशित 

यही कामना करता है उर, 

आरोग्य का पाएँ वरदान 

 दूर रहे दुख अंधकार हर !



गुरुवार, दिसंबर 29

सदा रहे जो

सदा रहे जो 


यहाँ-वहाँ, इधर-उधर 

उलझे हैं जो धागे मन के 

उन्हें समेटें 

बाँधें फिर समता खूँटे से

 डोर तान लें 

आज किसी का सम्बल पाया 

कल जब छलती होगी माया 

सदा रहे जो 

ऐसा इक आधार जान लें 

बाहर जग यह छिटक रहा है 

भीतर से एक द्वार खान लें !

जब निज का यह अंग बनेगा 

भेद कहीं तब कहाँ  रहेगा 

सारे उसके ही प्रतिनिधि  यहाँ 

यही जान बस उन चरणों के  

गा गान लें ! 


सोमवार, जुलाई 5

जैसे कोई द्वार खुला हो

 जैसे कोई द्वार खुला हो

भीतर-बाहर सभी दिशा में

बरस रहा वह झर-झर-झर-झर,

पुलक उठाता होश जगाता

भरता अनुपम जोश निरंतर !


जैसे कोई द्वार खुला हो

आज अमी की वर्षा होती,

आमन्त्रण दे मुक्त गगन भी

धार सहज ही रहे भिगोती !


रंचमात्र भी भेद नहीं है

जल से जल ज्यों मिल जाता है,

फूट गयीं दीवारें घट की

दौड़ा सागर भर जाता है !


मेघपुंज बन कभी उड़े मन

कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,

पीपल की ऊँची फुनगी पर

खगों के सुर में सुर भर रहा !


कभी दिशाएं हुईं सुवासित

सुख सौरभ चहुँ ओर बिखरता,

धूप रेशमी उतरी नभ से

जल कण से तृण कोर निखरता !


तन का पोर-पोर कम्पित है

गूँज इस ब्रह्मांड की सुनता,

उर बौराया चकित हुआ सा

देख-देख नव सपने बुनता !


मंगलवार, फ़रवरी 23

दिल की दास्तां

दिल की दास्तां 


जरा गौर से देखा तो यही पाया 

मगज है कि शिकायतों का इक पुलिंदा 

जो हर बात पे खफा रहता था

 यूँ तो जमाने के लिए बंद था दिल का द्वार 

पर उनमें ही हो जाता था 

खुद का भी शुमार 

 क्योंकि दिल से होकर ही खुशी उतरती है भीतर 

जब-जब कोई नाराज है जमाने से 

तब-तब दूर है दिल के खजाने से 

औरों के लिए न सही 

खुद के लिए मुसकुराना मत छोड़ो 

बेदर्द है जमाना कहकर 

दिल पर पत्थरों की दीवार मत जोड़ो

यह दुश्वारियाँ नहीं सह सकता 

बहुत नाजुक है 

अपना हो या औरों का 

इसे भूलकर भी मत तोड़ो 

यह टूट जाता है जब कोई उदास होता है 

चुप सी लगाकर बेबात ही खुद से खफा होता है 

जिस तरह भी रहे कोई जमाने में 

बस दूर न रहे दिल के तराने से 

जो वह गाता है दिन-रात 

हम अनसुना करते हैं 

और यूँ ही गम के आंसुओं से दामन भरते हैं !

 

गुरुवार, सितंबर 10

हर पल में इक द्वार खुल रहा

 हर पल में इक द्वार खुल रहा 

भूल गया जग गहन नींद में 

फिर भी खुद का भान हो रहा,

शब्दों ने घेरा स्वप्नों में  

मनस वहाँ ब्रह्मांड हो रहा !


कभी डराते, चेताते भी 

दु;स्वप्न जगाते भ्रम जाल से,  

किन्तु जागकर अक्सर ही मन 

डूबा रहे खामख्याल में !


हर पल में इक द्वार खुल रहा 

उस अनंत की झलक  दिखाए, 

किन्तु सांत का छोटा सा कण 

नजरों  से ओझल कर जाये !


इक दिन सब कुछ अच्छा होगा 

उस दिन की आस ही व्यर्थ है, 

नए-नए हम बीज बो रहे 

क्या जीवन का यही अर्थ है ! 


एक बार यदि रुककर कोई 

क्षण में सहज प्रवेश करेगा,

कालातीत असीम सत्य का  

निश्चय ही सन्देश सुनेगा !


शुक्रवार, मार्च 10

दिल का द्वार रहे उढ़काए


दिल का द्वार रहे उढ़काए 


नजर चुरायी जिस क्षण तुझसे 
खुद से ही हम  दूर हो गये, 
तेरे दर पर झुके नहीं जो 
 दिल खुद से मजबूर हो गये  !

स्वप्निल नैना बोझिल साँसें  
दूर खड़ी ललचाती मंजिल,
कितने दांवपेंच खेले पर 
सभी इरादे  चूर हो गये !

राग जगाता जग भरमाता 
हर सुकून सपना बन टूटा, 
मनहर खेल रचाए जितने  
आखिर सभी  कुसूर हो गये !

हर उस क्षण तू वहीं रुका था 
हाथ बढ़ाने से मिल सकता,
कैसी मदहोशी छायी थी 
भूले से मगरूर हो गये !

सुने थे तेरे कई फसाने 
है अनंत प्रेम का सागर,
दिल का द्वार रहे उढ़काए 
इसमें ही मशहूर हो गये !




बुधवार, दिसंबर 14

कितना सा था चाहत का घट

कितना सा था चाहत का घट 


श्वासें  भर जाएँ भावों से 
हो कृतज्ञ झुक जाये अंतर 
जीवन का उपहार मिला है 
बहता जैसे महा समंदर !

धूप नेह की खिली सघन जब 
प्रीत ऊष्मा मेघ बन गयी,
हुई  शुष्क जो नदिया उर की  
 बरस-बरस हो मगन  बह गयी !

कितना सा था चाहत का घट 
भर-भर कर ढुलका जाता है,
 दिशा-दिशा में वही समोया 
कितने दामन भर जाता है !

एक अतल सोता हो जैसे 
अंतहीन या कोई गह्वर,
जाने कहाँ से दे संदेशे 
सुनते ही आ जाते हैं स्वर !

खोलें तो हर द्वार है उसका 
उढ़काया तो वह ही बाहर,
हर आवाज उसी तक जाती 
लिए अनसुने उसके ही स्वर !



सोमवार, अक्टूबर 5

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा 

प्रतीक्षा का एक मौन क्षण
जहाँ कोई स्पंदन नहीं
उसका द्वार है
प्रतीक्षा यदि मिली हो थकहार कर
तो मिल जाती है पगडंडी वह
जिस पर चलना नहीं होता
कदम रखते ही अहसास होता है
मंजिल का
प्रतीक्षा पावन है 

मंगलवार, मार्च 24

हे !

हे !

तू ही जाने तेरी महिमा
मौन हुआ मन झलक ही पाकर,
छायी मधु ऋतु खोया पतझड़
अब न लौटेगा जो जाकर !

रुनझुन गुनगुन गूँजे प्रतिपल
बरस रही ज्योत्स्ना अविरत,
पग-पग ज्योति कलश बिखेरे
स्रोत अखंड अमी का प्रतिपल !

द्वार खुला है एक अनोखा
पार है जिसके मन्दिर तेरा,
हिमशिखरों सा चमचम चमके
आठ पहर ही रहे सवेरा !

टिमटिम दिपदिप उड्गण हो ज्यों
श्वेत पुष्प झर झर झरते हैं,
रूप हजारों तू धरता है
सौन्दर्य, रंग भरते हैं !

राज न कोई जाने तेरा
तुझ संग मिलना न हो पाए,
देख तुझे 'मैं' खो जाता है
'तू' ही बस तुझसे मिल पाए !


शनिवार, अगस्त 30

साझीदार


साझीदार


परमात्मा को हटा दें तो
इस जगत में बचता ही क्या है ?
उसका ऐश्वर्य !
उसकी विभूतियाँ और अनंत साम्राज्य !
मानव चाहे तो बन सकता है
उसका साझीदार
अन्यथा रह सकता है मात्र पहरेदार !
चुनना है उसे
मान अपना निहारना
या पुकारना
(जैसे कि वह कहीं दूर हो)
भीतर झाँकते ही द्वार खुलने लगता है
जैसे जल में डोलती नौका को
 मिल जाता है आधार
अथवा तो कम्पित उर को
आश्वस्ति भरा स्वीकर
प्रेम को हटा दें तो
जीवन में बचता ही क्या है ?
उसका अपनापन ! आत्मीयता और दुलार !
उसका अनंत फैलाव
मानव चाहे तो खो सकता है
अपना अहंकार
अन्यथा करता रह सकता है
संबंधों में व्यापार !

बुधवार, फ़रवरी 26

मिल गयी चाबी

मिल गयी चाबी


रात अँधेरी और घनेरी 

घर का रस्ता भूल गया वह,

दूर कहीं आवाज़ भयानक, 

भटक रहा भयभीत हुआ वह !


टप टप बूँदें, पवन जोर से 

ठंड हड्डियों को कंपाती,

तभी अचानक बिजली चमकी

इक दरवाज़ा  पड़ा  दिखाई !


​​झटपट पहुँचा द्वार खोलने, 

ताला जिस पर लटक रहा था,

सारी जेबें ली टटोल पर

चाबी कहीं गुमा आया था !


खड़ा रुआँसा भीगा, भूखा, 

याद आ रही कोमल शैया,

निद्रा-क्षुधा दोनों सताती, 

लेकिन वह था मजबूर बड़ा !


आसमान को तक के बोला 

तुम्हीं सहायक अब बन सकते,

तभी हाथ कंधे पर आया,

मित्र पूछता, क्या दे सकते?


खुशी और अचरज से बोला 

खोल द्वार चाहे जो माँगो,

तुरत घुमाई उसने चाबी

ला भीतर बोला, अब जागो !


मन ही तो वह भटका राही, 

द्वार आत्मा पर जो आता

बोध सखा स्वरूप  में आकर, 

बस पल में भीतर ले जाता I


मन पाता विश्राम जहाँ पर,

घर अपना वह सुंदर कितना

मिल गयी चाबी पाया तोष, 

‘हो’ होना चाहे फिर जितना I




गुरुवार, जून 7

मौन का उत्सव


मौन का उत्सव

ठठा कर हँसा वह
नजरें जो टिकीं थीं सामने
लौटा लीं खुद की ओर
और तभी गूंज उठा था सारा जंगल
उस मुखर अट्टाहस से....
ठिठक गए पल भर को
आकाश में गरजते मेघ
सुनने उस हास को
थम गया सागर की लहरों का तांडव
थमी थी जब वह हँसी
और भीतर मौन पसरा था
वहाँ कोई भी नहीं था
जैसे चला गया था कोई परम विश्राम को
अनंत समय बीता कि क्षणांश
कौन कहे
जब एक स्पंदन हुआ फिर
द्वार दरवाजे खुलने लगे
झरने लगे जिसमें से
सुगीत और आँच नेह की
जिसमें डूबने लगा था
सारा अस्तित्त्व
आज उसने स्वयं को उद्घाटित होने दिया था
अब महोत्सव की बारी थी..


मंगलवार, दिसंबर 6

जैसे कोई द्वार खुला हो



जैसे कोई द्वार खुला हो

भीतर-बाहर, सभी दिशा में
बरस रहा वह झर-झर, झर-झर,
पुलक उठाता, होश जगाता
भरता अनुपम जोश निरंतर !

जैसे कोई द्वार खुला हो
आज अमी की वर्षा होती,
आमन्त्रण दे मुक्त गगन भी
अंतर सहज ही रहे भिगोती !

रंचमात्र भी भेद नहीं है
जल से जल ज्यों मिल जाता है,
फूट गयीं दीवारें घट की
दौड़ा सागर भर जाता है !

मेघपुंज बन कभी उड़े मन
कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,
पीपल की ऊँची फुनगी पर
खग के सुर में सुर भर रहा !

कभी दिशाएं हुईं सुवासित
सौरभ सहज चहूँ ओर बिखरता,
धूप रेशमी उतरी नभ से
जल कण से तृण कोर निखरता !

तन का पोर पोर कम्पित है
गुंजन इस ब्रह्मांड की सुनता,
उर बौराया चकित हुआ सा
देख-देख सब सपने बुनता !