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बुधवार, अक्टूबर 14

अहंकार का भोजन दुख है

अहंकार का भोजन दुख है 


माँ की कृपा से कटती माया 

राग-द्वेष के बंधन काटे, 

ऊँची-नीची लहरों में भी

समता का इक कमल खिला दे !


सत् चित् आनंद स्वरूप है 

मानव ख़ुद का भेद न जाने, 

मिथ्या दुख का भागी बनकर 

निजता की गरिमा न जाने ! 


नहीं सरल समर्पण की राह 

पीड़ा से होकर जाती है, 

पर इक दिन बन जाती क्रीड़ा 

दुनिया सुखमय हो जाती है !


तीनों तापों से जलता है 

मन मानव का नित छलता है,

माया का आवरण न छूटे 

जब तक अहम् नहीं गलता है !


मेरे-तेरे की भाषा जब 

‘न मम’ में परिवर्तित होगी, 

 कुछ भी नहीं या सभी कुछ मैं 

जब तक नहीं प्रतीति होगी !


अहंकार का भोजन दुख है 

तिल-तिल वही सताता उर को, 

माँ के द्वार न पहुँचा जब तक 

सदा यही भरमाता मन को ! 


 

गुरुवार, जनवरी 26

समता की इक ढाल बना लें

समता की इक ढाल बना लें  


पुष्पों का मृदु हार बनें हम  

काँटों का चुभता ताज नहीं,

प्रीत सुरभि  हर सूं  बिखरायें  

उर बजे शोक का साज नहीं !


दुनिया आँख खोलकर देखें 

झर-झर अमिय निर्झरित होता,

समता की इक ढाल बना लें 

नादां  मन गर कंपित होता !


जीवन अभेद, जीवन अछेद्य

जग को अपना मीत बनायें, 

ले शिव-शक्ति का सदा आश्रय 

 कण-कण में उमंग बिखरायें ! 


अनदेखे  हर  बंधन छूटें 

मेरा-तेरा का महा बंध,  

कुछ भी नहीं, या हमीं सब कुछ  

फिर कैसा यह अंतरद्वंद्व !


हर मरीचिका छलना ही है  

छायाओं से कैसा डरना,  

भय की बेड़ी से जग बाँधे

उस प्रियतम से जुड़कर रहना  !


गुरुवार, दिसंबर 29

सदा रहे जो

सदा रहे जो 


यहाँ-वहाँ, इधर-उधर 

उलझे हैं जो धागे मन के 

उन्हें समेटें 

बाँधें फिर समता खूँटे से

 डोर तान लें 

आज किसी का सम्बल पाया 

कल जब छलती होगी माया 

सदा रहे जो 

ऐसा इक आधार जान लें 

बाहर जग यह छिटक रहा है 

भीतर से एक द्वार खान लें !

जब निज का यह अंग बनेगा 

भेद कहीं तब कहाँ  रहेगा 

सारे उसके ही प्रतिनिधि  यहाँ 

यही जान बस उन चरणों के  

गा गान लें ! 


सोमवार, अगस्त 29

सदा गूँजते स्वर संध्या के

 सदा गूँजते स्वर संध्या के


ग्रीष्म-शीत आते औ' जाते, 

बसे वसन्त सदा अंतर में, 

 रात्रि-दिवस का मिलन प्रहर हो

  सदा गूँजते स्वर संध्या के !


गुंजित वर्षा काल में बाग 

कोकिल के मधुरिम गीतों से,

अंतर उपवन सदा महकता 

ब्रह्म कमल की मृदु सुगन्ध से !


समता का जहाँ वायु विचरे

रस की खानों से मधु रिसता,

शशधर उर शीतल आभा दे 

भीगा हुआ प्रेम भी झरता !


मानसरोवर  के थिर जल में 

प्रातः जाग निज मुखड़ा देखे,

गोधूलि में विश्रांति पाता 

दिन भर विचरण करता जग  में  !


मंगलवार, अप्रैल 21

राम

राम  

ग्रीष्म-शीत आते औ' जाते, 
सदा वसन्त राम अंतर में, 
संध्या के स्वर सदा गूँजते 
रात्रि-दिवस की हर बेला में !

कोना-कोना होता गुंजित 
कोकिल के मधुरिम गीतों से,
सदा महकता उर का उपवन 
ब्रह्म कमल की मृदु सुगन्ध से !

समता का शुभ अनिल विचरता 
रस की खानों से मधु रिसता,
शशधर की शीतल आभा से 
भीगा हुआ प्रेम भी झरता !

उर सरिता के ठहरे जल में 
प्रातः अरुण निज मुखड़ा धोता,
दिन भर विचरण करता नभ में 
 आ पुनः वहीं विश्रांति पाता  !

शुक्रवार, मार्च 6

विपासना का अनुभव -३

विपासना का अनुभव 

पहले साढ़े तीन दिन श्वास पर ध्यान देने की विधि समझायी गयी, जिसे आना-पान कहते हैं. अगले साढ़े छह दिन विपश्यना का अभ्यास कराया गया जिसमें शरीर पर होने वाले स्पंदनों को समता भाव से देखना होता है. हर स्पंदन मन के भीतर गहराई में उठते किसी न किसी भाव अथवा विचार से जुड़ा होता है. हर भाव या विचार राग, द्वेष अथवा मोह जगाता है. राग जगने पर सुखद संवेदना होती है, द्वेष जगने पर दुखद संवेदना होती है तथा मोह जगने पर केवल संवेदना मात्र होती है. यदि साक्षी भाव से हमें संवेदनाओं को देखना आ जाये तो धीरे-धीरे मन के अंतरतम में छिपे संस्कारों से हम मुक्त हो सकते हैं. जितने समय हम समता भाव में रहते हैं कोई नया संस्कार नहीं बनाते तथा पुराने संस्कार क्षण-प्रति क्षण उदय होते हैं व अस्त होते हैं, भगवान बुद्ध की यह खोज थी कि देह अथवा चित्त पर प्रतिक्षण कुछ न कुछ उदय होता है और अस्त होता है. हम केवल ऊपर-ऊपर से देखते हैं तो दुःख का कारण बाहरी घटना, व्यक्ति या परिस्थिति को मानते हैं जिसके कारण भीतर द्वेष उठा, वास्तव में दुःख का कारण वह सुखद या दुखद संवेदना है, जिसे देखकर हम उसी क्षण दुःख से पार जा सकते हैं. यही विपश्यना का मुख्य सिद्धांत है.
प्रतिदिन सुबह छह बजे गोयनका जी की धीर-गम्भीर आवाज में ‘मंगल पाठ’ होता था बुद्ध वाणी का. जो पाली में था तथा जिसका अर्थ पूरी तरह समझ में नहीं आता था. शेष समय में भी गोयनका जी बुद्ध के धम्म पदों का उपयोग करते थे तथा बीच-बीच में स्वरचित दोहों के द्वारा उनका अर्थ स्पष्ट करते जाते थे. ठीक साढ़े छह बजे घंटा बजता था जिसका अर्थ था नाश्ते का समय हो गया है. होना तो यह चाहिए था कि नहाकर नाश्ता करें पर सभी पहले भोजनालय में पहुंच जाते जहाँ अक्सर सूजी का ढोकला, मीठी चटनी, काले चने की घुघनी, कोई एक फल, चाय, दूध मिला करता था. कभी-कभी पोहा व दलिया भी मिला जिसमें दूध नहीं था बल्कि हल्की मिठास थी. नाश्ते के बाद कुछ देर टहलने के बाद स्नान की तैयारी.

आठ बजे से कुछ क्षण पूर्व ही पुनः सभी हॉल में पहुँचे, गोयनका जी की आवाज में श्वास पर ध्यान देने की विधि सिखाई गयी. शुद्ध श्वास पर ध्यान देना था जिससे मन अपने आप केन्द्रित होता जाता था. नौ बजे के बाद पांच मिनट का विश्राम लेने को कहा गया. विश्राम का अर्थ था हॉल के बाहर बने पक्के फुटपाथों पर टहलना जिससे पैरों की जकड़न खुल जाती थी. कुछ लोग कमरे की तरफ भागते ताकि पांच मिनट लेट कर कमर सीधी कर लें. पुनः साधना का क्रम चला तो समय लम्बा खिंचता चला गया. गोयनका जी अपनी स्पष्ट व प्रखर वाणी में निर्देश दे रहे थे. पुरुषार्थ और पराक्रम करने की प्रेरणा भी बारी-बारी से हिंदी व अंग्रेजी भाषों में दे रहे थे. साधकों में विभिन्न राज्यों के तथा देशों के लोग थे, ज्यादातर स्थानीय थे.  ग्यारह बजे घंटे की आवाज से यह सत्र खत्म हुआ. यह दोपहर के भोजन का समय था. सात्विक, शाकाहारी भोजन परोसा जाता था, जिसमें पीली दाल, एक आलू की सब्जी जिसमें कभी मटर, कभी सफेद चने, कभी कटहल या टमाटर आदि होते थे. एक सूखी सब्जी, चावल तथा रोटी होती थी. छाछ व मीठी चटनी भी अक्सर मिलती थी.