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गुरुवार, जुलाई 23

भय केवल मन की छाया है

भय केवल मन की छाया है


अनजाने रस्तों पर चलते 

भय का कंपन भीतर उठता, 

किंतु उसे रोक नहीं पाये  

जो मन आगे-आगे बढ़ता !


हो अपार गगन जहाँ सम्मुख 

मार्ग स्वयं ही खुलता जाता, 

भय बनकर तो मात्र ह्रदय का 

अंधकार ही जलता जाता ! 


हो भयभीत न पीछे मुड़ना 

सदा स्वर्ण को तपना पड़ता, 

हर इक लपट निखारे जाती 

 अंतर ओज ही साहस बनता !


भय केवल मन की छाया है 

तोड़ सके कब संबल उर का, 

सच पल भर को ढक भी जाये 

संग अनंत जागरण नभ सा !


माना सच का मार्ग संकरा 

अनजाना औ' ऊँचा-नीचा, 

एक-एक पग आगे धरते   

भय के पार चले ही जाना ! 


भय मात्र आवरण बन सकता  

किंतु नहीं दीवार बन सके, 

कँपते कदमों से भी पथ पर 

पा लेता हर लक्ष्य, जो चले !

 

सोमवार, जुलाई 31

खुले न द्वार हृदय का जब तक

खुले न द्वार हृदय  का जब तक 


जीवन चिर बसंत सा मिलता 

यदि  कोई बाधा मत डाले, 

सुरभित ब्रह्मकमल सा खिलता 

आत्ममुग्धता ग़र तज डाले !


दिग दिगंत में जो फैला है 

छोटा सा बन हुआ संकुचित, 

खुले न द्वार हृदय  का जब तक 

कैसे मिलन घटेगा समुचित !


 रूप धरा वामन, विराट है

छा जाता भू-स्वर्ग हर कहीं, 

मिट जाये जो पा लेता है 

 नहीं जानता उर राज यही !


जो पहले था, सदा  रहेगा 

उसका स्वाद जरा लग जाये, 

दिल दीवाना रहे ठगा सा 

बार-बार मिट रहे रिझाये !


रविवार, फ़रवरी 26

तू सबब है यहाँ

 
तू सबब है यहाँ

हर घड़ी ख़ास है 

तू मेरे पास है, 

भर रहा नित नयी 

हृदय में आस है !


तुझको देखा नहीं 

पर बता तो सही, 

प्रीत की धार यह 

बिन मिले ही बही !


तू सबब है यहाँ 

जगत सजदा करे, 

हे  माया पति 

रच दे पल में जहाँ, 


कोई जाने नहीं 

तू ही सबमें छिपा, 

खुद को पा कर बँधा 

नित छुड़ा ही रहा !


मन हुआ क़ैद हैं 

अपने ही जाल में, 

कैसे छोड़ेगा तू 

हमें निज हाल में !


इल्म देता हुआ 

सदा रस्ता दिखा, 

ले चले है हमें

 प्यारा रहबर ख़ुदा !

सोमवार, नवंबर 28

सदा पुकारे जाता था वह

 सदा पुकारे जाता था वह

​​बढ़े हाथ को थामा जिसने 

पग-पग  में जो सम्बल  भरता,  

वही परम हो लक्ष्य हमारा 

अर्थवान जीवन को करता !


जन्मों से जो खोज चल रही 

अनजाने में हदें टटोलें, 

उसी प्रेम की है तलाश जो 

अंतर मन का पट जो खोले !


अब जाकर तो भान हुआ है 

सदा पुकारे जाता था वह, 

ठुकराया था भ्रमित हृदय ने 

अपनी निजता में सिमटे रह !


वही प्रेम वह  कोमल  करुणा

सहज  शांति, क्षमता भी देता, 

रग-रग में उल्लास जगाकर 

अर्थ अनंत  जगत  में भरता !


वही ध्येय वह प्राप्य बने जब 

शेष सहायक बन जाता है, 

वरना आते-जाते जग में 

निष्फल स्वेद बहा जाता है !




मंगलवार, अगस्त 23

मुक्ति का गीत


मुक्ति का गीत


मुक्त हूँ ! इस पल ! यहाँ पर !


मुक्त हूँ हर बात से उस 

हर घड़ी जो टोकती थी,

याद कोई जो बसी थी 

भय बताकर टोकती थी !


मुक्त हूँ नित भीत से भी 

तर्क के उन सीखचों से, 

तोड़ दी दीवार हर वह 

बोझ जिनका था सताता !


मुक्त हूँ ! इस पल ! यहाँ पर !


नील अम्बर सामने था

किंतु दिल यह उड़ न पाता,

 बांध ली थीं साँकलें कुछ  

क़ैद मन को कर लिया था !


मुक्त हूँ हर बात से उस 

हृदय को खिलने न देती 

सहज अपनापन जगाकर 

जो कभी मिलने न देती 


मुक्त  हूँ ! इस पल ! यहाँ पर !

बुधवार, जून 23

कुसुमित हुआ हो जैसे बीज


कुसुमित हुआ हो जैसे बीज

एक ऊर्जा है अनाम जो
खींच रही सदा अपनी ओर,
पता ठिकाना कौन जानता  
जिगर दीवाना जिसका मोर !

प्रेम उमगता भीतर आता
कहाँ से ? यही खबर न मिलती,
जिसकी तरफ उमड़ती धारा
जरा भनक ना उसकी पड़ती !

हृदय पिघलकर बहता जाता
राहें नहीं नजर आती है,
‘मैं’ खोया अशेष ‘वह’ कैसे
उसकी छाया मिट जाती है !

कण-कण में मधु बिखरा जिसका
कैसे एक दिगंत समाए,
हर इक घड़ी अमी बन जाती 
मिटकर ही अनंत को पाए !

तृप्त हुआ फिर डोले उर यह
कुसुमित हुआ हो जैसे बीज,
मंजिल पर ज्यों राह आ मिली
छूट गयी पथ-सफ़र की प्रीत !


शनिवार, मार्च 27

अब समेटें धार मन की

अब समेटें धार मन की 


खेलता है रास कान्हा 

आज भी राधा के संग,  

प्रीत की पिचकारियों से 

डाल रहा रात-दिन रंग !


अब समेटें धार मन की 

जगत में जो बह रही है, 

कर समर्पित फिर उसी के 

चरण कमलों में बहा दे !


हृदय राधा बन थिरक ले  

 बने गोपी भावनाएं,  

उस कन्हैया के वचन ही 

  टेरते हों बंसी बने !


होली मिलन शुभ घटेगा 

तृप्त होगी आस उर की, 

नयन भर कर देख लें फिर 

अनुपम झलक साँवरे की !

 

सोमवार, नवंबर 2

एक अगोचर वह अनदेखा

एक अगोचर वह अनदेखा

भरा-भरा घर किन्तु हृदय में

इक खालीपन सदा सताता,

सुना है कि कोई बिरला ही

भरे रिक्तता को मुस्काता !

 

अमल अनोखा एकांत यहाँ

जगत यह जिसको भर न पाए,

अजर, अगोचर वह अनदेखा

गीत न जब तक खुद गुंजाये ! 


जगत दे रहा जो दे सकता

अल्प मान और सम्मान भी,

अपनों की छाया भी मिलती

प्रश्नों का कुछ समाधान भी !

 

फिर भी कोई कमी अजानी

दिवस-रात साले जो मन को,

किसकी तृषा करे उर घायल 

किसका सपन पालती है वो !

 

उसके सिवा न कोई जाने

जीवन जिसने दिया मनोहर, 

अंतर को विश्राम मिलेगा

मिलन पूर्णता से हो जिस क्षण ! 

मंगलवार, जून 30

लिखे जो खत तुझे

लिखे जो खत तुझे 

हाथ से लिखे शब्द 
मात्र शब्द नहीं होते 
उनमें हृदय की संवेदना भी छिपी होती है 
मस्तिष्क की सूक्ष्म तंत्रिकाओं का कम्पन भी 
गहरा हो जाता है कभी कोई शब्द
कभी कोई हल्का 
कभी व्यक्त हो जाती है उनमें 
लिखने वाले की ख़ुशी 
कभी दर्द 
जो एक बूंद बन छलक जाये  
क्यों न हम फिर से लिख भेजें संदेश
स्वयं के गढ़े शब्दों से 
चाहे वे कितने ही अनगढ़ क्यों न हों 
न हो उनमें कोई दार्शनिकता या कोई सीख 
बस वे हमारे अपने हों 
क्यों न पुनः पत्र लिखें
 अपने हाथों से 
चाहे चन्द पंक्तियाँ ही
 कोरी, खालिस अपने मन से उपजी 
शुद्ध मोती की तरह पावन !


शुक्रवार, अक्टूबर 4

जब कभी भारी हो मन


जब कभी भारी हो मन

जब कभी भारी हो मन
लगे, न जाने कैसा बोझ रखा है मन पर
कारण कुछ भी हो....तब यही सोचना होगा
शायद पूर्व के संस्कार जागृत हुए हैं
या कोई कर्म अपना फल देने को उत्सुक है
अथवा तो बोये थे जो बीज अतीत में.. वे अंकुरित हो रहे हैं  
जब जीवन कुछ सवाल लेकर सम्मुख खड़ा हो
हल्का था जो मन भारी बड़ा हो
शिरायें तन गयी हों मस्तिष्क की
आघात कर रहा हो हृदय पर कोई
हो कंधों में तनाव और उत्साह की कमी
चाहिए जब एक विश्राम गहरा... एक नींद सुकून भरी !
एक मस्ती भीतर... एक शांति अचाह भरी !
पर सिर्फ चाहने भर से कहाँ कुछ होता है ?
उसके लिए सतत प्रयासरत रहना पड़ता है
जो हो रहा है उसे पूरे मन से स्वीकारना होता है
या फिर छोड़ देना है सब कुछ अनाम के चरणों में
हर नकारात्मक विचार एक नये दु:स्वप्न की तैयारी है
पर इन सबको देखने वाला साक्षी तो वैसा का वैसा है
यह सब कुछ घट रहा है उसकी ऊर्जा से ही
जो कभी खत्म होने में नहीं आती... वह ऊर्जा अनंत है
युगों-युगों से काँप रहे हैं अर्जुनों के गांडीव
पर कृष्ण अचल... निर्द्वन्द्व है !

सोमवार, जुलाई 30

शब्दों से ले चले मौन में


शब्दों से ले चले मौन में


माटी का तन ज्योति परम है
सद्गुरु रब की याद दिलाता,
है अखंड वह परम निरंजन
तोषण का बादल बरसाता !

खुद को जिसने जान लिया है
गीत एक ही जो गाता है,
एक तत्व में स्थिति हर क्षण 
अंतर प्रेम जहाँ झरता है !

शब्दों से ले चले मौन में
परिधि से सदा केंद्र की ओर,
गति से निर्गति में ले जाए
मिले नहीं कभी जिसका छोर !

परम आत्म का स्मरण दिलाता
सहज मूल की ओर ले चले,
सच से जो पहचान कराए
भेंट करा दे उस प्रियतम से !

इक से जिसने नाता जोड़ा
एक हुआ उसका अंतर मन,
अपने लिए नहीं जीता वह
जग हित उसका पावन जीवन !

मिटे सभी भय मीत बना जग
खाली हुआ हृदय घट उसका,
बांट रहा दोनों हाथों से
घटता नहीं रंच भर जिसका !

शुक्रवार, सितंबर 1

अनकहे गीत बड़े प्यारे हैं

अनकहे गीत बड़े प्यारे हैं

जो न छंद बद्ध हुए
बिल्कुल कुंआरे हैं
तिरते अभी गगन में  
गीत बड़े प्यारे हैं !

जो न अभी हुए मुखर
अर्थ कौन धारे हैं
ले चलें जाने किधर
पार नद उतारे हैं !

पानियों में संवरें
पी रहे गंध माटी
जी रहे ताप सहते
मौन रूप धारे हैं !

गीत गाँव व्यथा कहें 
भूली सी कथा कहें 
गूंजते, गुनगुनाते
अंतर संवारे हैं !

गीत जो हृदय छू लें
पल में उर पीर कहें
ले चलें अपने परों 
दूर से पुकारें हैं !