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शुक्रवार, नवंबर 25

हीरा मन

हीरा मन 


अँधेरे में टटोले कोई 

और हीरा हाथ लगे 

जो अभी तराशा नहीं  गया है 

पत्थर और उसमें  नहीं है कोई भेद

ऐसा ही है मानव का मन 

वही अनगढ़ हीरा लिए फिरता है आदमी 

अभी जड़ है देह 

और प्राणों में तीव्रता है उन्माद की 

जो  बहुत दूर नहीं ले जा पाती  

नकार की आदत 

हिंसा को जन्माती 

परिस्थितयां घिसेंगी पत्थर  को 

तो चमक उठेगा किसी  दिन  

पर अभी बहुत दूर जाना है 

कठोर राहों पर घिसाना है 

जब पारदर्शी होगा मन 

तो दुनिया भी आड़े नहीं आएगी 

भीतर कैद ज्योति 

पूरी शान से जगमगाएगी ! 

 

बुधवार, जनवरी 20

कुछ ख्याल


कुछ ख्याल 


‘कुछ’ होने से ‘कुछ नहीं’ हो जाना  

इश्क का इतना सा ही तो फ़साना  


चुप रहकर ही यह बयां होता है 

आवाजों में बस रुसवा होता है 


सुनो, सुनो और कुछ न कहो

उसी धारा में चुपचाप बहो 


उससे बढ़कर न कुछ था न होगा जमाने में 

उसी को आने दो हर बात, हर तराने में 


लाख पर्दों में छिपा हो हीरा चमक खो नहीं सकता 

जो सब कुछ है, वह कुछ नहीं में न हो, हो नहीं सकता 


मिट-मिट कर भी जो रह जाता है 

वह उसकी याद में गुनगुनाता है


 

गुरुवार, फ़रवरी 8

शून्य और पूर्ण



शून्य और पूर्ण


 तज देता है पात शिशिर में पेड़
ठूंठ सा खड़ा होने की ताकत रखता है
 अर्पित करे निज आहुति
सृष्टि महायज्ञ में
नुकीली चुभन शीत की सहता है
भर जाता कोमल कोंपलों औ’ नव पल्लवों से
 बसंत में वही खिल उठता है
त्याग देता घरबार सन्यासी
स्वागत करने को हर द्वार आतुर होता है
पतझड़ के बाद ही आता है बसंत
समर्पण के बाद ही मिलता है अनंत
शून्य हो सका जो वह पूर्ण बनता है
हीरा ही वर्षों माटी में सनता है !


मंगलवार, मई 8

मैं तुम और प्रेम


मैं तुम और प्रेम

मै, तुम और प्रेम एक ही शै के तीन नाम हैं
जिनसे पनपी हैं सारी सभ्यताएं
अतीत से भविष्य तक
बांधता है एक ही सूत्र भीतर से जिन्हें
ऊपर-ऊपर से ही है भेद
लेकिन तौला जाता है उपरी आवरण देख
चमकता हुआ पत्थर उठा लिया जाता है
हीरा समझ कर
जल्दी में हैं जो लोग
देख नहीं पाते वह आधार
जो जोड़ता है
एक महीन पारदर्शी फिल्म सा
जो है भी और नहीं भी
जिसमें लिपटा है ब्रह्मांड
जो होकर भी अव्यक्त है
इसी प्रकृति की ऊर्जा के पुजारी हैं
मैं, तुम और प्रेम.....