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रविवार, दिसंबर 4

लहरें और सागर



लहरें और सागर


लहर पोषित करती है स्वयं को 

सागर पूर्णकाम है 

लहार  चाह से भरी  है 

सागर  तृप्त  है

लहर दौड़ लगाती है 

शायद दिखाना चाहती है शौर्य तटों को 

सागर के सिवा कोई दूसरा नहीं 

दिखाए भी किसे 

लहर विशिष्ट है 

सागर निर्विशेष 

वह शुद्ध, बुद्ध 

मुक्त, तृप्त और आनंद स्वरूप है 

लहर की नज़र सदा अन्य पर रहती है 

सागर स्वयं में ठहरा है 

जब तक मिला नहीं सागर भीतर 

मन की लहर ही चलाती है 

सुख-दुःख झूले में झुलाती है 

सागर जुड़ा है अस्तित्व से 

लहर दूरियाँ बढ़ाती है 

सदा किसी तलाश में लगी 

कुछ न कुछ पाने की जुगत लगाती 

सागर में होना 

जगत नियंता के चरणों में बैठना है 

लहर से सागर की खोज एक यात्रा है 

 आनंद से भर  सकता है 

इस यात्रा का हर पल

यदि कोई लहर थम जाए 

और जान ले अपना सागर होना

 पल भर के लिए  !


शनिवार, सितंबर 24

लहर उठी सागर से कोई

लहर उठी सागर से कोई


​​तू मुझमें ही वास कर रहा

या मैं तेरे घर हूँ आया ?

रहना-आना दोनों मिथ्या  

एक तत्व है कौन पराया !


लहर उठी सागर से कोई 

अगले पल उसमें जा खोयी, 

पल भर का इक नर्तन करके 

निज स्वरूप में जाकर सोयी !


मेरा होना तुझसे ही है 

तू ही मैं बनकर खेले है, 

एक तत्व अखंड  शाश्वत नित 

दिखते जीवन के मेले हैं !


दर्शक बनकर देख रहा तू 

कैसे माया लीला रचती, 

मन खुद  को सर्वस्व समझता   

अंतर को फिर व्याकुल करती !



शुक्रवार, अगस्त 12

जानना

जानना 


लहर कहाँ जानती है 

सागर कितना गहरा है 

ऊपर ही ऊपर बनती व बिगड़ती 

मान लेती है यही उसकी नियति 

सूर्य रश्मियाँ नहीं जानतीं 

अग्नि का एक महासागर है सूरज 

कोई नहीं जानता 

ब्रह्मांडों की संख्या और सृष्टि का आदि-अंत 

हम जानने की प्रक्रिया भर हैं 

जानने का प्रयास ही मानव की संज्ञा है 

जो जानता है जितना अधिक 

उसके लिए उतना अधिक अजाना रह जाता है 

 जानता है जो कम

उसके लिए अल्प ही अज्ञात रहता है 

यही विरोधाभास 

जीवन का सौंदर्य है और यही रहस्य ! 





मंगलवार, नवंबर 9

मन चातक सा तकता रहता


मन चातक सा तकता रहता 


सागर के तट पर बैठा हो  

फिर भी कोई, प्यासा ! कहता, 

जीवन बन उपहार मिला है 

मन चातक सा तकता रहता !


अभी बनी खोयी पल भर में 

लहर जानती कहाँ स्वयं को, 

छोटे से जीवन में अपने 

टकराया करती आख़िर क्यों !


पीड़ा का क्या यही सबब है 

सीमित इक पहचान बनायी, 

माटी का पुतला है यह तन 

स्वप्नों में ही प्रीत रचायी !


कौन जोड़ता है कण-कण को 

किससे मानस क्या बना लहर,

नित्य अजन्मा है असंग जो 

एक तत्व ऐसा भी भीतर ?


रविवार, मई 16

उसी शाश्वत में टिकना है


उसी शाश्वत में टिकना है 

मिलना लहरों का क्या आखिर 
अभी बनी हैं अभी बिखरती 
सागर गहरा और अथाह है 
कितने तूफान उठते उसमें 
फिर भी देखो, बेपरवाह है ! 
पवन डुलाती लहरें उसमें  
बड़वानल भी इस सागर में 
फिर भी जरा सोच कर देखें 
जल का ही संग्रह विशाल है 
सागर यदि सूख भी जाए 
जल का न होता अभाव है 
इस प्रपंच का एक तत्व है ! 
ठहरा  है वह वसुंधरा पर
टिकी हुई जो नीले नभ में 
पंच तत्व के पार भी कुछ है 
जो इन सबको जान रहा है 
ज्ञान सदा ही बड़ा ज्ञेय से 
क्यों न सबका उसे श्रेय दें 
ज्ञाता में ही ज्ञान छिपा है 
उसी शाश्वत में टिकना है 
वहीं सहजता वहीं सरसता
वहीं कमल बन कर खिलना है ! 



 

मंगलवार, जुलाई 21

चाहे जो भी रूप धरा हो


चाहे जो भी रूप धरा हो 


जल ही लहर लहर से सागर 
जल ही बूंद भरा जल गागर, 
फेन बना कभी हिम् चट्टान 
वाष्प बना फिर उड़ा गगन पर !

चाहे जो भी रूप धरा हो 
जल तो आखिर जल ही रहता,
मानव मन भी इक नदिया सा 
अविरल अविरत  बहता रहता !

करुणामय बोल कभी बोले 
कभी क्रोध के भाव जगाये, 
कभी मधुर गीतों में डूबा 
लोभ की फिर छलाँग लगाए !

स्वयं नए संकल्प जगाता
खुद ही उनको काट गिराता,
खुद ही निज को कमतर आँकें 
तुलना कर निज को फँसवाता !

अपने ही सिद्धांत बनाये 
टूटें तो रह रह पछताए, 
सहता है उन पीड़ाओं को 
जिनके बिरवे स्वयं लगाए !

बुधवार, अप्रैल 29

जिस दिन लिखने को कुछ शेष न रहे

जिस दिन लिखने को कुछ शेष न रहे 

जिस दिन लिखने को कुछ शेष न रहे 
कहने को कोई शब्द न मिले 
नत मस्तक हो जाना ही होगा 
उस अनाम के आगे 
जो परे है वाणी के 
मौन में वह स्वयं का पता दे रहा है 
हमसे हमारा ‘अहम’ ले रहा है 
जो निःशब्द में सहज ही मिलता है
शब्दों के अरण्य में खो जाता है 
जैसे खो जाती है सूर्य किरण घने वनों में 
जहां वृक्षों की शाखाएँ सटी हैं इस तरह 
कि सदियों से नहीं पहुँची सूर्य की कोई किरण 
नहीं छुआ वहां की माटी को अपने परस से 
जहाँ काई और नमी में डेरा बना लिया है 
कीट-पतंगों ने 
मन में शब्दों का जमघट ‘उसे’ आने नहीं देता 
जो सदा ही उजास बनकर आसपास है 
इस सन्नाटे में उसी से भरना होगा मन का कलश 
और छलक-छलक कर वही रिसेगा 
भर जायेगा कण-कण में तन के 
ऊर्जा की एक लहर बन कर समो लेगा जब 
यह सत्य तभी स्पष्ट होगा कि 
एक लहर के सिवा क्या हैं हम ....? 

गुरुवार, दिसंबर 5

लहर उठी सागर में ऐसे


लहर उठी सागर में ऐसे



अभी-अभी इक लहर उठी है
अभी-अभी  इक महक जगी है,
अभी-अभी इक कुसुम खिला है
अभी-अभी इक बूँद झरी है !

लहर उठी सागर में ऐसे
दूर कहीं जाना हो जैसे,
तट से टकरा लौट ही गयी
आहत हुआ सजल तन कैसे !

सागर बाँह पसारे ही था
दिया आश्रय लहर को ज्यों ही,
गहन मिला विश्राम उसी पल
लौट गया ज्यों पंछी घर को !

मन भी दौड़ लगाना चाहे,
किंतु कहीं भी चैन न मिलता !
सागर जैसे उस अनंत को
पाकर ही मन मुकुर निखरता !

कभी कमल बन खिल जाता मन
किंतु महक भी साथ छोड़ती,
पल दो पल में कुम्हला जाता
चाहे वर्षा धार डुबोती !

सुख का स्रोत कहीं तो होगा
जो रूप, रस, गंध उड़ेंले,
अमिय अमित जो चाहे चखना
उस से जाकर  नाते जोड़े !



गुरुवार, अगस्त 23

पाया परस जब नेह का



पाया परस जब नेह का


तेरे बिना कुछ भी नहीं
तेरे सिवा कुछ भी नहीं,
तू ही खिला तू ही झरा
तू बन बहा नदिया कहीं !

तू लहर तू ही समुन्दर
हर बूंद में समाया भी,
सुर नाद बनकर गूँजता
गान तू अक्षर अजर भी !

है प्रीत करुणा भावना
सपना बना तू भोर में,
छू पलक तू ही जगाता
सुख सम भरा हर पोर में !

तुझसे हृदय की धड़कनें
मृत्यु है तेरी गोद में,
श्रद्धा, सबूरी, अर्चना,
नव चेतना हर शब्द में !

भीतर मिला हर स्वर्ग बन
जीवन का सहज मर्म तू,
खोयी कहीं दुःख की अगन
हर नीति औ’ हर धर्म तू !

कतरा-कतरा विदेह बन
डूबा सरल उर भाव में,
पाया परस जब नेह का
मन खो गया इस चाव में !

कण-कण पगा रस माधुरी
भीगा सा मन वसन हिले,
तेरी झलक जब थिर हुई
उर में हजार कमल खिले !

मद मस्त हो उर गा उठा
जीवन बिखरता हर घड़ी,
तू ही निखरता भोर में
तू ही सजा तारक लड़ी !

तू ही गगन में चन्द्रमा
तू ही धरा पर मन हुआ,
रविकर हुआ छू ले जहाँ
तू ही खिला बन कर ऋचा !


बुधवार, जनवरी 31

लहर उठी


लहर उठी

सहज तरंगित उच्छल ऊर्जित
लहर उठी विराट सागर में,
लक्ष्य नहीं है कोई जिसका
गिर जाती विलीन हो पल में !

छूता कोई दृश्य गगन का
कभी धरा हँसती अंतर में,
निज सृष्टि शुभा देख-देख ही
मुग्ध हो रहा कोई जग में !

कर वीणा तारों को झंकृत
हर्षित हो निनाद उपजाता,
सहज जगे जब पग में नर्तन
उर के भावों को दर्शाता !

 एक सत्य ही प्रकटे सब में
भाव जगें अंतर में ऐसे,
सहज ऊर्जा रवि बिखराता
 कृत्य झरें ऐसे ही जग में !

सोमवार, जनवरी 29

एक अजाना मौन कहीं है



एक अजाना मौन कहीं है


कभी उत्तंग नभ को छूतीं
कभी क्लांत हो तट पे सोतीं,
सागर को परिभाषित करतीं 
उन लहरों का स्रोत कहीं है !

कभी बुद्ध करुणानिधि बनता
रावण सा भी व्यर्थ गर्जता,
दुनिया जिसके बल पर चलती
उस मानव का अर्थ कहीं है !

अंतर को मधु से भर जाते
जोश बाजुओं में भर जाते,
विमल संग से हृदय पिघलता
उन गीतों का मर्म कहीं है !

भू की गहराई में सोया
नभ की ऊँचाई में खोया,
उर से जिसके शब्द फूटते
एक अजाना मौन कहीं है !

शुक्रवार, सितंबर 23

एक अरूप ज्योति बहती है

एक अरूप ज्योति बहती है

पीछे मुड़कर देखें जब तक
क्यों न आगे कदम बढ़ा लें,
चंद पलों में मिल जाती हैं
लहरें मन में नयी जगा लें !

इक-इक श्वास भरे है भीतर
कोष एक अनंत प्रेम का,
बंद किवाड़ों के पीछे हों
या फिर जग को मीत बना लें

खग, मृग, तितली, भंवरे पादप
स्रोत नेह का सदा लुटाते,
खोल हृदय का द्वार उन्हें भी
निज जीवन का अमी पिला लें !

एक अरूप ज्योति बहती है
एक सूत्र पिरोये सबको,
बनें फूल माला के हम भी
वैजन्ती फिर हार चढ़ा लें !


रविवार, जून 26

ज्यों की त्यों

ज्यों की त्यों

हर लहर जो सागर से निकलती है
सागर की खबर देती है
हर दुआ जो दिल से निकलती है
दिलबर की खबर ही देगी न ....
और दुआ ही क्यों, हर बददुआ भी
उसके बगैर तो आ नहीं सकती
 यह बात और है कि
हमें आदत है मिलावट की
हर शिशु निर्दोष ही आता है जग में
पर वैसा ही वापस नहीं जाता
कबीर की तरह मन को चादर को
ज्यों की त्यों रखना जो हमें नहीं आता !


रविवार, अगस्त 3

एक लहर शिव व सुंदर की


एक लहर शिव व सुंदर की


स्पृहा सदा सताती मन को
बढ़ जाता तब उर का स्पंदन,
सदानीरा सी मन की धारा
कभी न लेने देती रंजन !

संपोषिका प्रीत अंतर की
खो जाती हर पीड़ा जिसमें,
एक लहर शिव व सुंदर की
भर जाती थिरकन उर में !

मिटे स्पृहा प्रीत जगे जब
मुक्त खिलेगा अंतर उपवन,
सत्य साक्षी होगा जिस पल
सहज छंटेगा तिमिर का अंजन ! 

बुधवार, अगस्त 22

कवि की आत्मा




कवि की आत्मा

एक कविता हूँ मैं
अपने हाथों से लिखा है
जिसे परमात्मा ने
काव्य धर्म है जिसका.....

या अनंत के कैनवास पर
उसकी कूंची से खिंचा
एक स्ट्रोक
उत्सव कर्म है जिसका....

लहर हूँ एक
महाविस्तीर्ण सागर में
 सृष्टि के
नृत्य ही होना है जिसका....

शुक्रवार, मार्च 16

है बेबूझ बात यह दिल की


है बेबूझ बात यह दिल की

मदिर चाँदनी बिखरी जैसे
गुनगुन कोई गीत सुनाता,
तेरी यादों में मन खोया
काल का पंछी भी थम जाता !

लहरें उठतीं गिरतीं जैसे
बहे ऊर्जा का इक दरिया,
भाव मधुर वंशी बन गूंजे
मन चादर में पड़े लहरिया !

थिर कदमों में नृत्य समाये
मूक हुआ कोई हँसता जाये,
तृषित अधर मन इक प्याला हो
एक हाथ कोई ताल बजाए !

है बेबूझ बात यह दिल की
एक अनोखी सी महफिल की,
आँखों आँखों में ही घटती
तय होती दूरी मंजिल की !