शनिवार, मार्च 21

कविता दिल की भाषा जाने

कविता दिल की भाषा जाने

 

वाणी अटकी, बोल न फूटे

 अंतर का चैन कोई लूटे,

कविता दिल की भाषा जाने

कितने कूल-किनारे छूटे !

 

रागी मन बनता अनुरागी

भीतर कैसी पीड़ा जागी,

पलकों में पुतली सा सहेजे

भीतर लपट लगन की लागी !

 

उर में प्रीत भरे वह करुणा

डबडब नयना करें मनुहार,

छलक-छलक जाये ज्यों जल हो

गहराई में छिपा था प्यार !

 

सरल, तरल बहता मन सरि सा

घन बन के जो जम ना जाये,

अंतर उठी हिलोर उलीचे

नियति लुटाना, कवि कह जाये !

 

 

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