कविता दिल की भाषा जाने
वाणी अटकी, बोल न फूटे
अंतर का चैन कोई लूटे,
कविता दिल की भाषा जाने
कितने कूल-किनारे छूटे !
रागी मन बनता अनुरागी
भीतर कैसी पीड़ा जागी,
पलकों में पुतली सा सहेजे
भीतर लपट लगन की लागी !
उर में प्रीत भरे वह करुणा
डबडब नयना करें मनुहार,
छलक-छलक जाये ज्यों जल हो
गहराई में छिपा था प्यार !
सरल, तरल बहता मन सरि सा
घन बन के जो जम ना जाये,
अंतर उठी हिलोर उलीचे
नियति लुटाना, कवि कह जाये !
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